खराब फॉर्म और टीम चयन से बाहर होने की चर्चाओं के बीच संजू सैमसन ने बल्ले से जवाब दिया। 196 रन के मुश्किल लक्ष्य का पीछा करते हुए जब विकेट गिर रहे थे, तब जर्सी नंबर 9 पहने सैमसन एक छोर पर टिके रहे। उनकी नाबाद 97 रन की पारी ने भारत को सेमीफाइनल में पहुंचाया। यह सिर्फ रन नहीं थे, बल्कि भरोसे की वापसी थी।
तकनीक में छोटे लेकिन अहम बदलाव
पिछली सीरीज में उनके ट्रिगर मूवमेंट और संतुलन पर सवाल उठे थे। कई बार उनका शरीर गेंद से दूर हो जाता था और शॉट सही नहीं लगते थे। लेकिन इस मैच में उनकी तैयारी अलग दिखी। उन्होंने पहले से संतुलन बनाया, सिर स्थिर रखा और शॉट सीधे खेले। यह छोटा बदलाव उनके खेल में बड़ा फर्क लेकर आया।
पावरप्ले में समझदारी भरा खेल
196 रन के लक्ष्य के सामने शुरुआत आसान नहीं थी। पावरप्ले में दो विकेट गिर चुके थे। ऐसे में सैमसन ने बिना जल्दबाजी के रन बनाए। उन्होंने खराब गेंदों पर हमला किया और अच्छी गेंदों को सम्मान दिया। उनका स्ट्राइक रेट तेज रहा, लेकिन हर शॉट सोच-समझकर खेला गया। यही वजह थी कि टीम दबाव में नहीं टूटी।
स्पिन के खिलाफ असली परीक्षा
मध्य ओवरों में स्पिनरों के सामने भारत फंस सकता था। लेकिन सैमसन ने यहां भी समझदारी दिखाई। उन्होंने क्रीज का सही इस्तेमाल किया और गेंद को देर से खेला। जहां दूसरे बल्लेबाज रन बनाने में संघर्ष कर रहे थे, वहां उन्होंने तेजी से रन जोड़े। इससे मैच की दिशा बदल गई।
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एंकर नहीं, मैच नियंत्रक
अक्सर लंबी पारी खेलने वाले खिलाड़ी को एंकर कहा जाता है, लेकिन यह पारी उससे ज्यादा थी। सैमसन ने मैच की रफ्तार अपने हाथ में रखी। जब जरूरत पड़ी तो तेज खेले, जब दबाव बढ़ा तो धैर्य दिखाया। उन्होंने मैच को कभी अपने हाथ से फिसलने नहीं दिया। यही परिपक्वता पहले कम दिखती थी।
रणनीति में फिर मिला संतुलन
टीम संयोजन में बदलाव के बाद उन्हें फिर मौका मिला। ईशान किशन की एंट्री और बाहर होने की चर्चाओं के बीच सैमसन ने खुद को साबित किया। उन्होंने दिखाया कि वह सिर्फ आक्रामक खिलाड़ी नहीं, बल्कि मैच की गति तय करने वाले बल्लेबाज भी हैं। अगर यही लय बनी रही, तो यह पारी उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हो सकती है।