टीम इंडिया के श्रीलंका दौरे से पहले दो खिलाड़ियों की कहानी खास चर्चा में है। एक हैं मध्य प्रदेश के 33 साल के ऑलराउंडर सारांश जैन और दूसरे पंजाब के लंबे कद के तेज गेंदबाज गुरनूर बरार। दोनों का टीम इंडिया तक पहुंचने का रास्ता बिल्कुल अलग रहा, लेकिन एक चीज दोनों में समान है मुश्किल हालात में भी क्रिकेट का साथ नहीं छोड़ा। सारांश ने पिता की गंभीर बीमारी के बीच खुद को संभाला और घरेलू क्रिकेट में लगातार प्रदर्शन किया, जबकि गुरनूर ने पिता की पसंद से अलग क्रिकेट चुना और गंभीर चोट से वापसी करते हुए अपनी रफ्तार को पहचान बनाया।
पिता के शब्द बने सारांश की सबसे बड़ी ताकत
इंदौर के सारांश जैन के परिवार का क्रिकेट से पुराना रिश्ता रहा है। उनके पिता सुबोध जैन भी मध्य प्रदेश के लिए क्रिकेट खेल चुके हैं। सारांश के जीवन में सबसे मुश्किल दौर 2014 में आया। वह एक क्लब टीम के साथ ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट खेल रहे थे, उसी दौरान उनके पिता कैंसर से जूझ रहे थे और उनके चेहरे की सर्जरी हुई। परिवार ने यह बात सारांश से छिपाकर रखी ताकि उनका ध्यान क्रिकेट से न हटे। वापस लौटने पर जब उन्होंने पिता की हालत देखी तो परेशान हो गए। तब पिता ने उनके लिए लिखा कि वह ठीक हैं और बेटा जितना अच्छा खेलेगा, वह उतनी जल्दी ठीक होंगे। यही शब्द सारांश के लिए आगे बढ़ने की ताकत बन गए।
54 मैचों में 2223 रन और 188 विकेट
सारांश ने इसके बाद घरेलू क्रिकेट में लगातार अपनी जगह मजबूत की। बाएं हाथ से बल्लेबाजी और दाएं हाथ से ऑफ स्पिन करने वाले इस खिलाड़ी ने 54 प्रथम श्रेणी मुकाबलों में 2223 रन बनाए और 188 विकेट हासिल किए। उनकी सबसे बड़ी खासियत गेंद और बल्ले दोनों से टीम के काम आने की क्षमता है। लंबे इंतजार के बाद 33 साल की उम्र में उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली। श्रीलंका दौरा अब उनके लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खुद को साबित करने का बड़ा मौका बन सकता है।
बास्केटबॉल खिलाड़ी के बेटे ने चुना क्रिकेट
दूसरी तरफ गुरनूर बरार की कहानी बिल्कुल अलग है। उनके पिता सुखवीर सिंह बरार पंजाब पुलिस में एएसआई हैं और राष्ट्रीय स्तर पर बास्केटबॉल खेल चुके हैं। पिता चाहते थे कि बेटा भी बास्केटबॉल में आगे बढ़े, लेकिन गुरनूर का मन क्रिकेट में था। दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज तेज गेंदबाज डेल स्टेन को देखकर उन्होंने तेज गेंदबाज बनने का सपना देखा। करीब 15 साल की उम्र तक गुरनूर ने पेशेवर क्रिकेट प्रशिक्षण भी नहीं लिया था। वह मोहल्ले में टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलते थे, लेकिन उनकी रफ्तार ने धीरे-धीरे उनके लिए आगे का रास्ता खोल दिया।
चोट ने रोका रास्ता, लेकिन नहीं टूटा सपना
करीब छह फीट पांच इंच लंबे गुरनूर की रफ्तार के साथ उनका उछाल बल्लेबाजों के लिए बड़ी चुनौती बनता है। उनके करियर में मुश्किल तब आई जब पीठ में स्लिप डिस्क की परेशानी हुई। तेज गेंदबाज के लिए यह गंभीर झटका था, लेकिन उन्होंने अपने रन-अप और गेंदबाजी एक्शन पर काम किया और फिटनेस के दम पर वापसी की। इसके बाद 2025 में गुजरात टाइटंस ने उन्हें 1.3 करोड़ रुपये में अपने साथ जोड़ा। ऑस्ट्रेलिया-ए के खिलाफ प्रदर्शन ने भी चयनकर्ताओं का ध्यान उनकी तरफ खींचा।
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शुभमन गिल से गुरनूर का खास कनेक्शन
गुरनूर के सफर में शुभमन गिल की भूमिका भी खास रही। 2024 की आईपीएल नीलामी में खरीदार नहीं मिलने के बाद गिल ने उन्हें गुजरात टाइटंस के साथ नेट गेंदबाज के तौर पर जुड़ने की सलाह दी थी। गुरनूर ने इस मौके का फायदा उठाया और लगातार अपनी गेंदबाजी पर काम किया। आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें डेब्यू कैप भी शुभमन गिल के हाथों मिली और उनके पहले अंतरराष्ट्रीय विकेट का कैच भी गिल ने ही पकड़ा। अब श्रीलंका दौरे पर सारांश जैन और गुरनूर बरार दोनों के सामने खुद को साबित करने की चुनौती होगी। एक की ताकत उसका ऑलराउंड खेल है तो दूसरे का हथियार रफ्तार और उछाल। संघर्ष से टीम इंडिया तक पहुंचे इन दोनों खिलाड़ियों पर अब क्रिकेट प्रशंसकों की नजरें टिकी हैं।