Satya Niketan Incident: दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत के ढहने की घटना ने राजधानी में छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और कई लोग घायल हुए हैं। राहत एवं बचाव अभियान करीब 27 घंटे तक चला। जांच के दौरान इमारत की मंजूरी, निर्माण और बेसमेंट में चल रहे काम को लेकर कई अहम सवाल सामने आए हैं।
मंजूरी से ज्यादा मंजिलें, फिर भी चलता रहा पीजी
जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में पीजी संचालित हो रहा था, उसे कथित तौर पर केवल सीमित मंजिलों के लिए अनुमति मिली थी, जबकि वास्तविक निर्माण उससे कहीं अधिक था। रिपोर्टों के मुताबिक इमारत में ग्राउंड फ्लोर के अलावा चार अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नियमों के उल्लंघन के बावजूद यहां छात्रों के रहने की व्यवस्था कैसे जारी रही। हादसे के बाद पुलिस ने मालिक के परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार किया है, जबकि नगर निगम के पांच अधिकारियों को भी निलंबित किया गया है।
बेसमेंट में काम ने बढ़ाई आशंका
हादसे के वक्त इमारत के बेसमेंट में निर्माण या मरम्मत से जुड़ा काम चल रहा था। शुरुआती जांच में पानी जमा होने और बेसमेंट में चल रहे काम को भी संभावित कारणों में शामिल किया गया है। हालांकि हादसे की अंतिम वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। करीब पांच दशक पुरानी बताई जा रही इस इमारत की संरचनात्मक मजबूती और उसमें किए गए बदलावों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
छात्रों के सामने मजबूरी क्यों?
दिल्ली में देशभर से बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। विश्वविद्यालयों और संस्थानों के आसपास सुरक्षित और किफायती हॉस्टल की कमी के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी पीजी का सहारा लेते हैं। यही मजबूरी कई बार उन्हें ऐसी इमारतों में रहने के लिए मजबूर करती है, जहां सुरक्षा मानकों की पर्याप्त जानकारी या गारंटी नहीं होती। सत्य निकेतन हादसे ने इसी समस्या को उजागर किया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी छात्र आवासों की सुरक्षा और पीजी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अब हर पीजी की जांच की मांग
हादसे के बाद दिल्ली में पीजी और हॉस्टल भवनों की सुरक्षा जांच की मांग तेज हो गई है। हाईकोर्ट ने भी एमसीडी के अधिकार क्षेत्र में आने वाले हॉस्टलों की जांच और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कदम उठाने को कहा है। प्रशासन की ओर से स्ट्रक्चरल ऑडिट और सुरक्षा प्रमाणन जैसे उपायों पर जोर दिया जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि कार्रवाई केवल हादसे के बाद तक सीमित न रहे, बल्कि पहले से ऐसी इमारतों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित कराया जाए।
व्यवस्था पर सवाल
सत्य निकेतन की घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली आने वाले छात्र सुरक्षित आवास के लिए निजी पीजी पर निर्भर हैं। अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि नियमों का उल्लंघन कैसे हुआ, निगरानी तंत्र कहां कमजोर पड़ा और जिम्मेदारी किसकी थी। कार्रवाई के साथ ऐसी व्यवस्था बनाना भी जरूरी है, जिससे किसी छात्र की जिंदगी सस्ते और असुरक्षित आवास की कीमत न बने।