
Atomic Bomb: सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए पारस्परिक रक्षा समझौते ने पूरे मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस समझौते को नाटो के अनुच्छेद 5 की तर्ज पर तैयार बताया जा रहा है, जिसके तहत किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। यह पहली बार है जब रियाद ने इस तरह का समझौता केवल एक साझेदार देश के साथ किया है। सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि पाकिस्तान के पास मौजूद करीब 170 परमाणु हथियारों का अप्रत्यक्ष सुरक्षा कवच अब सऊदी अरब को भी मिल गया है। यानी बिना खुद परमाणु बम बनाए ही सऊदी ने एक तरह से "परमाणु छतरी" हासिल कर ली है।
परमाणु कार्यक्रम में सऊदी की पुरानी भूमिका
विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के रिश्ते कई दशक पुराने हैं। 1970 के दशक में जब पाकिस्तान ने परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू किया, तब उसे भारी आर्थिक मदद की जरूरत थी। उस दौर में सऊदी अरब ने अरबों डॉलर देकर पाकिस्तान की मदद की। माना जाता है कि दोनों देशों के बीच एक गुप्त समझौता हुआ था, जिसके तहत किसी खतरे की स्थिति में पाकिस्तान, सऊदी को परमाणु हथियार उपलब्ध करा सकता है। यही वजह है कि बार-बार ऐसी चर्चाएं सामने आती रही हैं कि सऊदी अरब पाकिस्तान की परमाणु ताकत पर भरोसा कर सकता है।
मौजूदा हालात और दोनों देशों का फायदा
आज की स्थिति में यह समझौता पाकिस्तान और सऊदी, दोनों के लिए फायदेमंद है। पाकिस्तान को अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अरबों डॉलर की मदद मिल सकती है, जबकि सऊदी अरब अमेरिकी सुरक्षा पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने लिए "वास्तविक बैकअप" तैयार कर रहा है। पाकिस्तान की लंबी दूरी तक मार करने वाली शाहीन-3 जैसी मिसाइलें सऊदी के दुश्मनों के लिए सीधी चेतावनी साबित हो सकती हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि रियाद ने बिना परमाणु हथियार विकसित किए, पाकिस्तान के साथ समझौते के जरिए अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हासिल कर लिया है।