पाकिस्तान और सऊदी अरब ने हाल ही में एक ऐसी डिफेंस डील पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस समझौते को NATO की तर्ज पर तैयार किया गया है, यानी किसी एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान की मजबूरी साफ है, क्योंकि वह भारत से तनाव के चलते मजबूत सहयोगी चाहता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब, जो अमेरिका का पुराना साझेदार और तेल संपन्न देश है, उसे इस समझौते के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा?
पाकिस्तान का नजरिया
पाकिस्तान की स्थिति समझना आसान है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया था। इसमें पाकिस्तान और उसके आतंकी ढांचे को भारी नुकसान उठाना पड़ा। भारत के ब्रह्मोस मिसाइल अटैक से घबराकर पाकिस्तान ने युद्धविराम की गुहार लगाई। इस घटना ने पाकिस्तान को मजबूर कर दिया कि वह एक मजबूत सैन्य सहयोगी की तलाश करे, ताकि भारत के दबाव का सामना कर सके।
सऊदी अरब की मजबूरी
सऊदी अरब के लिए यह समझौता सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि कई रणनीतिक मजबूरियों का नतीजा है।
1. अमेरिका पर अविश्वास – सऊदी अब पहले जैसी अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर भरोसा नहीं करता।
2. ईरान से तनातनी – ईरान और सऊदी के रिश्ते लंबे समय से तल्ख हैं।
3. इजरायल का खतरा – हाल ही में इजरायल ने कतर की राजधानी दोहा में हमास नेताओं पर हमला किया। इससे सऊदी को चिंता है कि इजरायल भविष्य में उस पर भी नजर गड़ा सकता है।
4. पाकिस्तान का न्यूक्लियर पावर होना – परमाणु संपन्न पाकिस्तान सऊदी के लिए एक सुरक्षा कवच जैसा है।
5. इस्लामिक देशों को एकजुट करना – सऊदी अरब खुद को मुस्लिम वर्ल्ड का नेता साबित करना चाहता है।
भू-राजनीतिक मायने
यह डिफेंस डील न सिर्फ पाकिस्तान के लिए सुरक्षात्मक कवच है, बल्कि सऊदी अरब के लिए भी अमेरिका से दूरी बनाकर एक नया सामरिक संतुलन खोजने की कोशिश है। इजरायल-हमास युद्ध और अमेरिका की निष्क्रियता ने सऊदी को झकझोर दिया है। ऐसे में पाकिस्तान के साथ यह रक्षा गठबंधन उसे एशिया और मिडिल ईस्ट दोनों में ताकतवर संदेश देने का मौका देता है।