मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव की लपटें तेज हो गई हैं। वर्षों से करीबी सहयोगी रहे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) आमने-सामने आ गए हैं। यमन के मुकल्ला पोर्ट पर सऊदी अरब द्वारा UAE से जुड़े जहाजों पर किए गए हमले ने पूरे अरब क्षेत्र में हलचल मचा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर दो दोस्त मुल्क दुश्मनी की राह पर क्यों बढ़ गए।
मुकल्ला पोर्ट पर क्यों हुआ हमला
सऊदी अरब का दावा है कि यमन के मुकल्ला बंदरगाह पर UAE के जहाज हथियारों और बख्तरबंद वाहनों की डिलीवरी कर रहे थे। सऊदी के मुताबिक, ये हथियार यमन के उन गुटों तक पहुंचाए जा रहे थे जो उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। सऊदी सेना ने रॉकेट हमले कर इन जहाजों को निशाना बनाया और इस कार्रवाई को “सीमित लेकिन जरूरी” बताया।
राष्ट्रीय सुरक्षा को बताया ‘रेड लाइन’
सऊदी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी कीमत पर खतरे में नहीं डाली जा सकती। बयान में कहा गया कि यह कार्रवाई क्षेत्रीय शांति को बचाने के लिए की गई और इसमें जान-माल के नुकसान को न्यूनतम रखा गया। हालांकि हमले में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन बंदरगाह को भारी नुकसान पहुंचा है।
UAE पर लगे गंभीर आरोप
सऊदी अरब का आरोप है कि UAE समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) की गतिविधियां यमन में अस्थिरता बढ़ा रही हैं। दावा किया गया कि जिन जहाजों पर हमला हुआ, वे फुजैराह बंदरगाह से रवाना हुए थे और उनका ट्रैकिंग सिस्टम बंद था। सऊदी के अनुसार, इन जहाजों से उतारे जा रहे हथियार दक्षिणी यमन में सक्रिय अलगाववादी गुटों के लिए थे।
24 घंटे का अल्टीमेटम
घटनाक्रम के बाद सऊदी अरब ने UAE से जुड़े सैनिकों को यमन छोड़ने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। इसे दोनों देशों के रिश्तों में अब तक का सबसे बड़ा तनाव माना जा रहा है। इस कदम से यह साफ हो गया है कि सऊदी अब किसी भी तरह के परोक्ष दबाव या सैन्य गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करेगा।
यमन में तीन गुट और जटिल हालात
यमन इस समय तीन प्रमुख गुटों में बंटा हुआ है—हूती विद्रोही, सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल और प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल। हूतियों को ईरान का समर्थन माना जाता है, STC को UAE का, जबकि राष्ट्रपति परिषद को सऊदी अरब का सहयोग हासिल है। यही टकराव सऊदी और UAE के बीच मतभेद की जड़ बन गया है।
पुरानी दोस्ती क्यों टूटी
विशेषज्ञों का मानना है कि यमन संकट के दौरान UAE ने सऊदी अरब से अलग रुख अपनाना शुरू कर दिया था। दक्षिण यमन में अलगाववादी ताकतों के मजबूत होने से सऊदी को यह आशंका हुई कि यमन एकजुट नहीं रह पाएगा। यही रणनीतिक मतभेद धीरे-धीरे दोनों देशों को आमने-सामने ले आए।