बहुजन समाज पार्टी के सामने अब सिर्फ उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन वापस हासिल करने की चुनौती नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय दल की पहचान बचाने का सवाल भी खड़ा हो गया है। पार्टी का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। राज्यसभा में उसका एकमात्र सदस्य रामजी गौतम हैं, जिनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। उत्तर प्रदेश में भी बसपा का कोई विधायक या विधान परिषद सदस्य नहीं है। रसड़ा से विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में पार्टी का खाता बंद हो गया।
चार राज्यों में राज्य स्तरीय दल की मान्यता
राष्ट्रीय दल का दर्जा बरकरार रखने के लिए निर्वाचन आयोग के नियमों में तय कई मानकों में से कम से कम एक पूरा करना जरूरी है। इनमें चार राज्यों में राज्य स्तरीय दल की मान्यता, चार या अधिक राज्यों में निर्धारित मत प्रतिशत के साथ लोकसभा सीटें जीतना अथवा लोकसभा में कम से कम दो प्रतिशत सीटें हासिल कर सांसदों का कम से कम तीन राज्यों से निर्वाचित होना शामिल है।
विधानसभा चुनाव में 403 सीटों पर उम्मीदवार
बसपा के लिए सबसे बड़ी चिंता उसका लगातार घटता जनाधार है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को देशभर में सिर्फ 2.04 प्रतिशत मत मिले और एक भी सीट नहीं मिली। उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बावजूद केवल रसड़ा सीट जीत सकी। मत प्रतिशत 12.88 रहा, जबकि 2017 में पार्टी को 19 सीटों के साथ 22.24 प्रतिशत मत मिले थे।
फिलहाल बसपा के पंजाब, बिहार और उत्तराखंड में एक-एक विधायक हैं। उत्तराखंड में 2022 में मिली दो सीटों में से मंगलौर उपचुनाव में कांग्रेस के हाथ चली गई। राजस्थान में 2019 में पार्टी के सभी छह विधायक कांग्रेस में चले गए थे।
निर्वाचन आयोग की समीक्षा का खतरा बढ़ सकता है
अब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के साथ पंजाब और उत्तराखंड की चुनावी जंग मायावती के लिए निर्णायक होगी। पार्टी यदि कई राज्यों में अपना मत प्रतिशत और सीटें बढ़ाने में सफल नहीं होती तो राष्ट्रीय दल की मान्यता पर निर्वाचन आयोग की समीक्षा का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में विपक्षी खेमे के असंतुष्ट नेताओं को अपने पाले में लाने की कवायद के साथ मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिखरे संगठन को फिर से चुनावी ताकत में बदलने की है।