Som Pradosh Vrat Katha: सावन के दूसरे सोमवार को इस बार सोम प्रदोष व्रत का भी संयोग बन रहा है। भगवान शिव की आराधना के लिए सोमवार और प्रदोष दोनों ही विशेष माने जाते हैं। ऐसे में एक ही दिन दोनों पर्व पड़ने से शिवभक्तों के लिए यह अवसर और भी खास हो गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सच्चे मन से महादेव की पूजा और व्रत करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। पंचांग के अनुसार, 10 अगस्त 2026 को प्रदोष काल शाम 7 बजकर 05 मिनट से रात 9 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इसी अवधि में भगवान शिव की पूजा करना विशेष शुभ माना गया है। इस दौरान शिवलिंग का अभिषेक करने, भगवान शिव को प्रिय वस्तुएं अर्पित करने और विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है। सोम प्रदोष के दिन पूजा के साथ इसकी कथा सुनने या पढ़ने का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि कथा के श्रवण से व्रत का पुण्य बढ़ता है। आइए जानते हैं सोम प्रदोष से जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथा।
सोम प्रदोष व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, किसी समय एक नगर में एक गरीब ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रहती थी। उसके पति का निधन हो चुका था और परिवार की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। जीवन-यापन के लिए वह रोज सुबह अपने बेटे के साथ घर से निकलती और लोगों से भिक्षा मांगकर किसी तरह अपना गुजारा करती थी। एक दिन घर लौटते समय उसकी नजर एक घायल युवक पर पड़ी। वह युवक बेहद परेशान और असहाय हालत में था। ब्राह्मणी को उस पर दया आ गई और वह उसे अपने घर ले आई। उसे यह पता नहीं था कि जिस युवक को उसने सहारा दिया है, वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि विदर्भ का राजकुमार है।
दरअसल, राजकुमार के राज्य पर शत्रुओं ने हमला कर दिया था। उसके पिता को बंदी बना लिया गया था और पूरा राजपाट दुश्मनों ने अपने कब्जे में कर लिया था। इसी वजह से राजकुमार को अपना राज्य छोड़कर भटकना पड़ रहा था। ब्राह्मणी ने उसे अपने घर में रहने की जगह दी और उसकी देखभाल करने लगी। कुछ समय बाद एक गंधर्व कन्या जिसका नाम अंशुमति था, उसकी नजर राजकुमार पर पड़ी। वह राजकुमार को पसंद करने लगी। अगले दिन वह अपने माता-पिता के साथ उससे मिलने पहुंची। राजकुमार का स्वभाव और व्यक्तित्व उन्हें भी अच्छा लगा।
कथा में आगे बताया गया है कि कुछ समय बाद अंशुमति के माता-पिता को स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। महादेव ने उन्हें राजकुमार और अंशुमति का विवाह कराने का संकेत दिया। इसके बाद दोनों परिवारों की सहमति से राजकुमार और अंशुमति का विवाह संपन्न हो गया।
उधर, ब्राह्मणी पूरी श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत करती थी। माना जाता है कि उसके व्रत और भगवान शिव की भक्ति के प्रभाव से राजकुमार की परिस्थितियां बदलने लगीं। गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने अपने शत्रुओं का सामना किया और अंततः विदर्भ पर दोबारा अपना अधिकार हासिल कर लिया। राज्य वापस मिलने के बाद राजकुमार ने उस ब्राह्मणी के बेटे को भी सम्मान दिया और उसे अपने राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया। इस तरह ब्राह्मणी की शिवभक्ति और प्रदोष व्रत के प्रभाव से राजकुमार और उसके परिवार के जीवन में फिर से खुशियां लौट आईं।