Crude Oil Price Forecast : भारत की अर्थव्यवस्था के सामने कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर बड़ी चुनौती बन सकती हैं। एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत अगले 10 कारोबारी दिनों में 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह एक अनुमान है, कीमतों में इतनी बढ़ोतरी होना तय नहीं है। अगर ऐसा होता है, तो भारत के लिए तेल आयात का खर्च बढ़ सकता है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
भारत की तेल खरीद पर कितना पड़ेगा असर?
एसबीआई रिसर्च के अनुमान के मुताबिक, अगर ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो भारत की कच्चे तेल की बास्केट का दाम करीब 130 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। रिपोर्ट में भारतीय बास्केट की कीमत लगभग 127 डॉलर से बढ़कर 130 डॉलर तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा पर भी दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
रुपये के सामने क्यों बढ़ सकती है चुनौती?
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोलियम बाजार तक सीमित नहीं रहता। तेल आयात करने के लिए भारत को बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपये को संभालना मुश्किल हो सकता है। एसबीआई रिसर्च ने भी तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव को रुपये के लिए जोखिम बताया है। हालांकि, रुपये की चाल पर विदेशी निवेश, व्यापार संतुलन और अमेरिकी डॉलर की मजबूती जैसे दूसरे कारकों का भी असर पड़ता है।
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रुपये को संभालने के लिए RBI ने क्या कदम उठाए?
तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को सहारा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम के लिए डॉलर की विशेष व्यवस्था शामिल है। इसका उद्देश्य इन कंपनियों की डॉलर की मांग को खुले विदेशी मुद्रा बाजार से हटाना है। एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, तेल कंपनियों की करीब 10 से 12 अरब डॉलर की मासिक मांग को इस व्यवस्था के जरिए पूरा करने की योजना है। इसके बावजूद रिपोर्ट का कहना है कि केवल RBI के कदम रुपये को लंबे समय तक मजबूत रखने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।
क्या पेट्रोल-डीजल और दूसरी चीजें महंगी होंगी?
अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी होती है, तो भारत का आयात खर्च बढ़ सकता है। इससे परिवहन, माल ढुलाई और उत्पादन की लागत पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है। इसका असर आगे चलकर कई वस्तुओं की कीमतों पर भी दिख सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत बढ़ ही जाएंगी। घरेलू कीमतों पर सरकारी फैसलों, तेल कंपनियों की लागत और दूसरे आर्थिक कारकों का भी असर पड़ता है।
भारत के पास कितना सुरक्षा कवच है?
एसबीआई रिसर्च ने संभावित जोखिमों के बावजूद कहा है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल हालात से निपटने के लिए पर्याप्त है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में देश का भुगतान संतुलन अधिशेष घटकर 55 से 60 अरब डॉलर के आसपास रह सकता है। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 3 नवंबर 2026 से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमतें सीमित दायरे में रह सकती हैं और कूटनीतिक प्रयासों के साथ आपात तेल भंडार से कुछ राहत मिल सकती है। इसलिए अगले 10 कारोबारी दिनों में तेल की कीमत 110 डॉलर तक पहुंचना एक अनुमान है, पक्की भविष्यवाणी नहीं।