देशभर में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में लगी BLO टीमों पर बढ़ते कार्यभार और लगातार सामने आ रही मौतों के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे तुरंत अतिरिक्त कर्मचारी तैनात करें, ताकि मौजूदा BLOs पर पड़ रहा दबाव कम हो सके। अदालत ने साफ कहा कि यह एक वैधानिक कार्य है और राज्य सरकारें पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हैं।
काम का बोझ कम करने के लिए राज्यों को कड़े निर्देश
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि BLOs राज्य सरकारों के कर्मचारी हैं, इसलिए काम का प्रबंधन भी राज्यों की जिम्मेदारी है। अदालत ने सुझाव दिया कि जहां 10,000 कर्मियों की जरूरत हो, वहां 20,000–30,000 कर्मचारी भी लगाए जा सकते हैं, ताकि ड्यूटी के घंटे और लक्ष्य दोनों का दबाव संतुलित हो सके।
यदि कोई BLO बीमार है या किसी कारणवश ड्यूटी करने में सक्षम नहीं है, तो राज्य वैकल्पिक कर्मचारी तैनात कर सकता है।
‘जरूरत हो तो कर्मचारी बदलें… दबाव नहीं डालें’ — CJI सूर्य कांत
सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने टिप्पणी की कि यदि किसी BLO को वास्तविक कठिनाई है, तो संबंधित अधिकारी उसे दूसरी ड्यूटी पर तैनात कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि BLOs पर अत्यधिक दबाव डालना या कठोर कार्रवाई करने की चेतावनी देना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता द्वारा यह जानकारी दी गई कि विभिन्न राज्यों में अब तक 35–40 BLOs की मौतें अत्यधिक दबाव और लंबी ड्यूटी के कारण हुई हैं।
नोटिस, FIR और सख्ती पर अदालत की चिंता
याचिका में बताया गया कि कई राज्यों में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 32 के तहत BLOs को नोटिस जारी किए जा रहे हैं कि लक्ष्य पूरा न करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई या जेल तक भेजा जा सकता है।
सिर्फ उत्तर प्रदेश में 50 FIR दर्ज होने का भी हवाला दिया गया। अदालत ने कहा कि यदि ऐसा दबाव डाला जा रहा है, तो राज्यों को तुरंत इस व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए।
SIR प्रक्रिया पर उठे सवाल, मुआवजे की मांग पर विचार
सुनवाई के दौरान यह भी दलील दी गई कि SIR प्रक्रिया के दौरान काम के कारण कई परिवारों ने अपने सदस्यों को खोया है। इसलिए मृत BLOs के परिजनों के लिए मुआवजे की मांग भी रखी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों को संवेदनशीलता के साथ इस मुद्दे पर निर्णय लेना चाहिए।