SC/ST ACT SUPREME COURT LEGAL CHALLENGE : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में खास तौर पर धारा 18-A के तहत प्रारंभिक जांच के बिना FIR और गिरफ्तारी से पहले अनुमति की जरूरत नहीं होने वाले प्रावधानों पर सवाल उठाए गए हैं। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दाखिल याचिका में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारों का हवाला दिया गया है।
किन धाराओं को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती?
याचिका बृजभूषण सैनी और 18 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दाखिल की गई है। इसमें SC/ST एक्ट की धारा 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18-A और 19 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इन प्रावधानों में से कुछ संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 में दिए गए अधिकारों से टकराते हैं।
धारा 18-A पर सबसे बड़ा सवाल
याचिका में धारा 18-A को विशेष रूप से चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इस प्रावधान के तहत SC/ST एक्ट के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति भी जरूरी नहीं है। याचिका में तर्क दिया गया है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। साथ ही पुलिस कार्रवाई को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश तय करने की मांग की गई है।
2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का भी जिक्र
याचिकाकर्ताओं ने 2018 में धारा 18-A जोड़े जाने को सुप्रीम कोर्ट के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए फैसले के संदर्भ में चुनौती दी है। याचिका में दावा किया गया है कि संसद ने उस फैसले में दिए गए निर्देशों को प्रभावहीन करने के लिए यह प्रावधान बनाया। हालांकि इन दलीलों पर अंतिम फैसला अदालत की सुनवाई और उसके निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।
अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी का मुद्दा
याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान SC/ST एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत के रास्ते को सीमित करता है और गलत या दुर्भावनापूर्ण आरोपों की स्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। धारा 8 के कुछ प्रावधानों को भी निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के संदर्भ में चुनौती दी गई है।
सजा और अंतरिम राहत पर भी मांग
याचिका में धारा 19 के तहत दोषसिद्ध मामलों में परिवीक्षा से जुड़ी राहत उपलब्ध नहीं होने पर भी सवाल उठाया गया है। वहीं धारा 3(2)(v) और 3(2)(i) से जुड़े सजा संबंधी प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित आनुपातिकता के सिद्धांत के संदर्भ में चुनौती दी गई है। अंतरिम आवेदन में धारा 8, 18, 18-A और 19 के संचालन पर रोक लगाने की मांग भी की गई है। केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को मामले में पक्षकार बनाया गया है।