
शारदीय नवरात्रि 2025 की शुरुआत आज 22 सितंबर, सोमवार से हो रही है। यह पर्व देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का पावन अवसर होता है, जो आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवमी तक चलता है। नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। शैलपुत्री देवी पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और इन्हें प्रकृति, दृढ़ता व शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना और शैलपुत्री पूजा का विशेष महत्व होता है। इस बार प्रतिपदा तिथि 21 सितंबर की रात 11:56 बजे से शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9:47 बजे तक रहेगी। पूजा व कलश स्थापना के लिए सुबह 06:10 से 07:45 बजे तक का समय अत्यंत शुभ है। इस समय अभिजीत मुहूर्त भी पड़ रहा है, जो कलश स्थापना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
पूजा सामग्री
मां शैलपुत्री की पूजा में विशेष रूप से निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है: मिट्टी का कलश, जल, आम या अशोक के पत्ते, नारियल, लाल कपड़ा, अक्षत (चावल), रोली, चंदन, दीपक, धूप, फूल, पंचमेवा, फल, मिठाई, कमल गट्टा, सुपारी, बेलपत्र और दुर्गा सप्तशती की पुस्तक।
पूजा विधि
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सबसे पहले कलश स्थापना करें—कलश में जल भरें, उसमें सुपारी, सिक्का, अक्षत डालें और आम के पत्ते लगाकर नारियल रखें। फिर मां शैलपुत्री का ध्यान करें और उन्हें रोली, चावल, फूल, चंदन आदि अर्पित करें। मां को सफेद फूल व मिष्ठान अर्पित करें, क्योंकि यह रंग उन्हें प्रिय है। इसके बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ करें या "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" मंत्र का जाप करें। अंत में मां की आरती उतारें और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।
विशेष ध्यान देने योग्य बातें
नवरात्रि व्रत में केवल फलाहार करना चाहिए और दिनचर्या को सात्विक बनाए रखना आवश्यक होता है। घर में अखंड ज्योति जलाना, भजन-कीर्तन करना और नकारात्मक विचारों से दूर रहना लाभकारी होता है। शारदीय नवरात्रि का पहला दिन शक्ति के आह्वान और साधना की शुरुआत का प्रतीक है। मां शैलपुत्री की उपासना से जीवन में स्थिरता, मानसिक शांति और आत्मबल प्राप्त होता है। यह पर्व आध्यात्मिक ऊर्जा से भरने वाला एक दिव्य अवसर है, जिसे पूरे श्रद्धा भाव से मनाना चाहिए।