
नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता को समर्पित होता है। मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं और उन्हें कमलासन पर विराजमान, चार भुजाओं वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। उनका वाहन सिंह है, जो उनकी शक्ति और साहस का प्रतीक है। इस दिन मां की उपासना करने से भक्तों को बुद्धि, ज्ञान और संतान सुख की प्राप्ति होती है। मां स्कंदमाता करुणा और मोक्ष की देवी मानी जाती हैं, और उनकी कृपा से साधक जीवन की सभी कठिनाइयों को पार कर सकता है।
पूजा विधि, मंत्र और आरती
छठे दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें और मां स्कंदमाता की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप प्रज्वलित करें। उन्हें पीले फूल, चंदन, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। मां को केला अत्यंत प्रिय है, इसलिए केले का भोग विशेष रूप से अर्पित करें। इस दिन "ॐ देवी स्कंदमातायै नमः" मंत्र का 108 बार जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। मां की आरती करते समय श्रद्धा भाव से यह पंक्तियाँ गाएं – "जय स्कंदमाता जय जय अंबे, भक्तजनन की संकट हरनी, दया करो मुझ पर अंबे।" आरती के दौरान घंटी और दीपक से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
भोग और आशीर्वाद
मां स्कंदमाता को भोग में केले के साथ-साथ बेसन के लड्डू या अन्य मिठाइयाँ भी अर्पित की जाती हैं। पूजा के पश्चात भोग को प्रसाद रूप में सभी में बांटना शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा साधक को आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ पारिवारिक सुख और संतान संबंधी समस्याओं से मुक्ति दिलाती है। मां स्कंदमाता की उपासना से जीवन में स्थिरता, संतुलन और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।