बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना (Sheikh Hasina) को बीते एक साल से भारत में शरण लिए हुए हैं। छात्र आंदोलन के दौरान हिंसा और मानवता के खिलाफ अपराध (Crime against Humanity) के मामले में उन्हें मौत की सजा दी है।
हसीना को 30 दिनों की मोहलत दी
ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने सोमवार को हसीना को फांसीे सजा सुनाई है. ट्रिब्यूनल के साथ ही हसीना की सारी प्रॉपर्टी जब्त करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट में अपील करने को लेकर हसीना को 30 दिनों की मोहलत दी है. इसके साथ ये शर्त भी रखी गई है कि उन्हें भारत से ढाका लौटना होगा.
हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा
बांग्लादेश में बीते वर्ष जुलाई में आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन होने के कारण तख्तापलट हो गया था। शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा। हालात इतने खराब हो गए कि शेख हसीना आज तक अपने देश लौट नहीं सकीं। उन्हें सबकुछ छोड़कर भारत में रहना पड़ा। भारत सरकार ने उन्हें राजनीतिक शरण दी।
17 लोगों को हमेशा के लिए खोना पड़ा था
हालांकि, ये पहली बार नहीं है कि जब हसीना को भारत आना पड़ा है। बांग्लादेश में 50 साल पहले 15 अगस्त 1975 को सेना ने तख्तापलट कर दिया था। इस खूनी तख्तापलट में शेख हसीना को अपने परिवार के 17 लोगों को हमेशा के लिए खोना पड़ा था. उसी समय भारत ने पहली बार हसीना और उनकी बहन रेहाना को पनाह दी थी. हसीना तब अपनी बहन के साथ दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में मिसेज मजूमदार बनकर रह रही थीं.
दिल्ली का शेख हसीना से गहरा कनेक्शन
कोठी नंबर 56, लाजपत नगर, दिल्ली का शेख हसीना से गहरा कनेक्शन है। यह कोठी शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान की है, जो बांग्लादेश के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति थे। शेख मुजीबुर रहमान 1966-69 के दौरान इस कोठी में रहे थे, जब वे पाकिस्तान सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे।
कोठी से जुड़ी खास बातें
1966-69 में शेख मुजीबुर रहमान इस कोठी में रहे थे। 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान यह कोठी शरणार्थियों के लिए आश्रय स्थल बन गई। वहीं 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद, उनकी पत्नी बेगम फजिलातुन्निसा मुजीब और बेटियां शेख हसीना और शेख रेहाना इस कोठी में रहीं। 1981 में शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं। इस कोठी को अपने परिवार के लिए सुरक्षित स्थान बनाया।