बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बुधवार को दिल्ली में आयोजित एक वर्चुअल बातचीत में मीडिया से देश की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए 2024 के छात्र आंदोलन को सुनियोजित राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने आंदोलन को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ संगठित समूहों ने इसे हिंसक रूप दे दिया।
बांग्लादेश को कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए देख रही हूं
शेख हसीना ने कहा, "आज मैं सिर्फ उस व्यक्ति के रूप में नहीं बोल रही हूं, जिसे पांच बार बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनने का सम्मान मिला, बल्कि मैं शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी के रूप में भी आपसे बात कर रही हूं। मैं वो शख्स हूं, जिसने अपना पूरा जीवन बांग्लादेश के लोगों के साथ बिताया है। मुझे अपने देश से दूर कर दिया गया, लेकिन मैं कभी अपने लोगों से अलग नहीं हुई। पिछले दो वर्षों से मैं अपने प्रिय बांग्लादेश को कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए देख रही हूं। डर लोगों के घरों, कार्यस्थलों और विश्वविद्यालय परिसरों तक पहुंच गया है। यह वह बांग्लादेश नहीं है, जिसे हमने मिलकर बनाया था। यह वह बांग्लादेश भी नहीं है, जिसके लिए 1971 में 30 लाख लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।"
शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की कोशिश
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा मैं जुलाई और अगस्त 2024 की सच्चाई से शुरुआत करना चाहती हूं। मेरे अनुसार यह कोई शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन नहीं था। शुरुआत से ही मेरी सरकार ने इस मुद्दे को बातचीत, कानूनी प्रक्रिया और धैर्य के जरिए शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की कोशिश की थी। लेकिन सुधार की मांग के पीछे कुछ संगठित समूह छात्रों की मांगों को एक हिंसक राजनीतिक हथियार में बदलने का काम कर रहे थे। मुहम्मद यूनुस ने स्वयं कहा था कि यह एक बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया आंदोलन था, जिसका नेतृत्व एक मास्टरमाइंड कर रहा था। उनके अपने शब्दों ने यह दिखाया कि यह सिर्फ अचानक शुरू हुआ छात्र प्रदर्शन नहीं था।
सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का कोई स्पष्ट या जिम्मेदार नेतृत्व सामने नहीं था। निर्देश पर्दे के पीछे से दिए जा रहे थे। यह संगठित था, इसे योजनाबद्ध तरीके से चलाया जा रहा था, और इसका इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया के बाहर सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाने के लिए किया जा रहा था। 15 जुलाई से इस आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा। हत्याएं, आगजनी, हमले और लूटपाट की घटनाएं शुरू हो गईं। सरकारी संस्थानों और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और उन्हें नष्ट किया गया। उन्होंने कहा, "धांधली वाले चुनाव के जरिए बीएनपी के सत्ता में आने के बाद भी हालात नहीं बदले। बांग्लादेश आज भी डर, आतंक, निराशा, आर्थिक परेशानियों और गहरी असुरक्षा के माहौल में जकड़ा हुआ है।"