बांग्लादेश और भारत के रिश्तों में पिछले कुछ समय से आई तल्खी के बीच अब ढाका के रुख में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद दोनों देशों के संबंधों में कई स्तरों पर तनाव देखने को मिला था। हालांकि, अब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भारत के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिश करती नजर आ रही है। माना जा रहा है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में ढाका ज्यादा व्यावहारिक रुख अपना सकता है।
भारत के साथ रिश्तों को लेकर बदली रणनीति
बांग्लादेश के लिए भारत के साथ संबंध रणनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। व्यापार, सीमा प्रबंधन, ऊर्जा, परिवहन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे कई मुद्दों पर दोनों देश एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में लंबे समय तक तनावपूर्ण रिश्ते बांग्लादेश के लिए भी चुनौती पैदा कर सकते हैं। यही वजह है कि ढाका अब भारत के साथ बातचीत के रास्ते को मजबूत करने पर जोर देता दिखाई दे रहा है। रिश्तों में सुधार की यह कोशिश किसी एक मुद्दे तक सीमित न होकर व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में हो सकती है।
शेख हसीना के बाद क्यों बढ़ी थी दूरी?
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में बड़ा बदलाव आया। भारत के साथ उनके लंबे समय से मजबूत संबंध रहे थे, जिसके कारण सत्ता परिवर्तन के बाद नई राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद उभरकर सामने आए। बांग्लादेश में भारत की नीतियों और पूर्व सरकार के साथ उसके संबंधों को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हुई। इसी दौरान दोनों देशों के बीच बयानबाजी और कूटनीतिक तनाव की स्थिति बनी। हालांकि, अब संकेत मिल रहे हैं कि बांग्लादेश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए भारत के साथ व्यावहारिक संबंधों को प्राथमिकता देना चाहता है।
व्यापार और कनेक्टिविटी पर है बड़ा दांव
भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक संबंधों का दायरा काफी व्यापक है। दोनों देशों के बीच व्यापार के अलावा सड़क, रेल, जलमार्ग और ऊर्जा संपर्क भी महत्वपूर्ण हैं। बांग्लादेश के लिए भारत के साथ बेहतर संबंध क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मददगार हो सकते हैं। वहीं भारत के लिए भी बांग्लादेश पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ाव और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पड़ोसी है। इसलिए दोनों देशों के बीच संबंधों में स्थिरता का असर केवल द्विपक्षीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।
आगे की राह बातचीत और संतुलन से तय होगी
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को पूरी तरह सामान्य होने में अभी कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। सीमा से जुड़े मुद्दे, राजनीतिक बयानबाजी, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से जुड़े सवाल दोनों देशों के बीच चर्चा का हिस्सा बने रह सकते हैं। इसके बावजूद अगर ढाका और नई दिल्ली राजनीतिक मतभेदों को अलग रखते हुए व्यापार, सुरक्षा और कनेक्टिविटी जैसे साझा हितों पर ध्यान देते हैं, तो रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार संभव है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि यह 'रीसेट' महज कूटनीतिक संकेत रहता है या वास्तव में संबंधों की नई शुरुआत करता है।