महाराष्ट्र की राजनीति में उस वक्त भूचाल आ गया जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष Harshvardhan Sapkal ने छत्रपति Shivaji Maharaj और Tipu Sultan की तुलना को लेकर बयान दिया। बयान सामने आते ही भाजपा नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई और सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए। मामला अब राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर कानूनी कार्रवाई और इनाम की घोषणा तक पहुंच चुका है।
बयान क्या था और क्यों भड़का विवाद?
हर्षवर्धन सपकाल ने एक कार्यक्रम में कहा कि टीपू सुल्तान को शिवाजी महाराज के बराबर एक योद्धा और स्वराज्य प्रेमी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शिवाजी की बहादुरी बेमिसाल है और टीपू ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। यह बयान बुलढाणा में एक स्थानीय विवाद के संदर्भ में दिया गया था, जहां एक कार्यालय से टीपू सुल्तान की तस्वीर हटाने को लेकर बहस छिड़ी थी। बयान सार्वजनिक होते ही इसे शिवाजी महाराज के सम्मान से जोड़कर देखा गया और विवाद बढ़ गया।
भाजपा का पलटवार, सड़कों पर प्रदर्शन
Devendra Fadnavis ने इस टिप्पणी को “शर्मनाक” बताया और कहा कि ऐसे बयान से समाज में गलत संदेश जाता है। पुणे समेत कई शहरों में भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर सपकाल के पोस्टर जलाए। कुछ नेताओं ने चौराहों पर उनकी तस्वीरें लगाकर विरोध दर्ज कराया। बयानबाज़ी के दौरान एक स्थानीय नेता ने उनकी जीभ काटने वाले को 10 लाख रुपये इनाम देने की घोषणा कर दी, जिससे विवाद और गहरा गया।
तीखी प्रतिक्रियाएं और केस दर्ज
भाजपा प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने कहा कि कांग्रेस नेता को माफी मांगनी चाहिए। वहीं, सपकाल के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज किया गया है। राजनीतिक गलियारों में यह मुद्दा तेजी से गरमाता जा रहा है और दोनों दल आमने-सामने आ गए हैं।
सफाई में क्या बोले सपकाल?
विवाद बढ़ने के बाद सपकाल ने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिवाजी महाराज की तुलना किसी से नहीं की जा सकती और उनका उद्देश्य ऐतिहासिक संदर्भ में चर्चा करना था। उन्होंने कहा कि वे खुली बहस के लिए तैयार हैं, लेकिन बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करना उचित नहीं है।
इतिहास की पृष्ठभूमि ने बढ़ाई संवेदनशीलता
शिवाजी महाराज का जन्म 1627 में हुआ और उन्होंने मराठा साम्राज्य की नींव रखी। वहीं, टीपू सुल्तान का जन्म 1751 में हुआ और उन्होंने मैसूर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। दोनों अलग-अलग कालखंडों के शासक रहे, लेकिन महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज की ऐतिहासिक और भावनात्मक अहमियत अत्यंत गहरी है। यही कारण है कि तुलना का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ गया है।