कभी सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण का दिल आज भी इस धरती पर धड़क रहा है? ये सिर्फ एक कल्पना नहीं, बल्कि आस्था और रहस्य का अद्भुत संगम है। महाभारत के युग के बाद भगवान श्रीकृष्ण का पवित्र हृदय न सिर्फ अग्नि से अजर-अमर रहा, बल्कि समय की धाराओं को पार करता हुआ ओडिशा के पुरी में पहुंचा। आज उसी हृदय को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर सुरक्षित माना जाता है – जो आज भी धड़कता है! आइए जानिए इस अद्भुत मान्यता और दिव्य रहस्य से जुड़ी पूरी कथा।
जब बहेलिए ने श्रीकृष्ण को मछली समझकर चला दिया तीर
महाभारत के युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण वन में एक पीपल के पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे। तभी एक बहेलिया आया, जिसने उनके पैर के तलवे को मछली समझकर तीर चला दिया। तीर लगने से भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर त्याग दिया।
अग्नि में जल गया शरीर, लेकिन नहीं जला हृदय
पांडवों ने विधिपूर्वक भगवान श्रीकृष्ण का अंतिम संस्कार किया। अग्नि में पूरा शरीर भस्म हो गया, लेकिन उनका हृदय अग्नि में भी नहीं जला। उसका दिव्य तेज आज भी उतना ही अद्भुत बना रहा। इसे देखकर पांडवों ने हृदय को समुद्र में प्रवाहित कर दिया।
पुरी के तट पर मिला चमत्कारी हृदय, बना लकड़ी का लट्ठ
समुद्र की लहरों के साथ वह पवित्र हृदय बहकर ओडिशा के पुरी तट पर पहुंचा, जहां वह एक लकड़ी के लट्ठ में परिवर्तित हो गया। पुरी के राजा इंद्रद्युम्न ने एक स्वप्न में इसका संकेत पाया और अगले दिन समुद्र किनारे जाकर वह लट्ठ प्राप्त किया।
विश्वकर्मा ने रचा दिव्य इतिहास – बनीं भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां
राजा के आदेश पर देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा ने उसी लट्ठ से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों का निर्माण किया। मान्यता है कि इन्हीं मूर्तियों में श्रीकृष्ण का दिव्य हृदय आज भी सुरक्षित रूप से धड़कता है।
हर 15-20 साल में बदली जाती हैं मूर्तियां, होता है ‘नवकलेवर’
पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां हर 15-20 साल में एक बार नीम की खास लकड़ी से बदली जाती हैं। इस दौरान ‘नवकलेवर’ अनुष्ठान होता है, जिसमें पुराने स्वरूपों को नई मूर्तियों में स्थानांतरित किया जाता है।
26 जून से शुरू होगी भव्य रथ यात्रा, मिलेगी मोक्ष की अनुभूति
हर साल आषाढ़ माह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपनी मौसी के घर ‘गुंडीचा मंदिर’ के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस बार 26 जून (गुरुवार) से रथ यात्रा का शुभारंभ होगा। मान्यता है कि जो भक्त इस यात्रा में शामिल होते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।