सोने की चमक के बीच चांदी ने हमेशा थोड़ा शांत लेकिन भरोसेमंद सफर तय किया है। साल 2000 में इसे ज्यादातर एक औद्योगिक धातु माना जाता था, लंबी रेस का घोड़ा नहीं। लेकिन समय ने यह धारणा पूरी तरह बदल दी। महंगाई, वैश्विक संकट और बाजार की उठापटक के बीच चांदी ने अपनी मजबूती दिखाई। यही वजह है कि आज निवेशक इसे सिर्फ गहनों या उद्योग तक सीमित नहीं देखते, बल्कि लंबी अवधि के निवेश विकल्प के तौर पर भी गंभीरता से लेते हैं।
₹10 हजार से ₹2.64 लाख तक का सफर
अगर साल 2000 में किसी निवेशक ने चांदी में सिर्फ ₹10,000 लगाए होते और 25 साल तक धैर्य रखा होता, तो आज उसकी वैल्यू करीब ₹2,64,550 होती। यानी निवेश लगभग 26 गुना बढ़ जाता। Forbes की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 में भारत में चांदी की औसत कीमत करीब ₹7,900 प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर करीब ₹2.17 लाख प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। इसका मतलब है 2,600% से ज्यादा का रिटर्न। यह आंकड़ा साफ बताता है कि लंबी अवधि में चांदी ने धन को न सिर्फ सुरक्षित रखा, बल्कि तेजी से बढ़ाया भी।
शेयर बाजार की हलचल में बनी सुरक्षा ढाल
सोने की तरह चांदी भी कई दशकों से महंगाई और बाजार की अस्थिरता के खिलाफ एक मजबूत कवच साबित हुई है। जब-जब शेयर बाजार में गिरावट आई, कई बार चांदी ने पोर्टफोलियो को संभालने का काम किया। डॉट-कॉम क्रैश, वैश्विक वित्तीय संकट और महामारी जैसे दौर इसके उदाहरण हैं। Yes Bank की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चांदी आज सिर्फ सेफ हेवन नहीं रही, बल्कि AI, डेटा सेंटर, सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे सेक्टरों की बढ़ती मांग से भी जुड़ गई है। इससे इसकी अहमियत और बढ़ गई है।
2025 में रिकॉर्ड, आगे क्या संकेत?
साल 2025 में चांदी ने नए रिकॉर्ड छुए हैं। वैश्विक तनाव, डॉलर की कमजोरी और सप्लाई में कमी ने कीमतों को और हवा दी। भारत में MCX पर चांदी ने ऑल-टाइम हाई स्तर छुआ, जबकि इस साल रिटर्न के मामले में चांदी ने सोने को भी पीछे छोड़ दिया। हालांकि चांदी थोड़ी ज्यादा अस्थिर मानी जाती है, लेकिन इसका इतिहास बताता है कि जो निवेशक लंबे समय तक टिके रहे, उन्हें बड़ा फायदा मिला। मौजूदा हालात में चांदी एक मजबूत दीर्घकालिक निवेश और पोर्टफोलियो डायवर्सिफायर के रूप में फिर से चर्चा में है।