मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ 2028 को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। इस बार किन्नर अखाड़ा भी बड़े स्तर पर आयोजन में भागीदारी की तैयारी कर रहा है। इसी सिलसिले में उज्जैन में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में देशभर से आए किन्नर संतों और साधु-संतों ने भाग लिया। बैठक में सिंहस्थ की तैयारियों, किन्नर समाज की भूमिका और संगठन के विस्तार को लेकर चर्चा की गई, साथ ही दो नए महामंडलेश्वर की घोषणा भी की गई।
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों पर विशेष बैठक
धार्मिक नगरी उज्जैन में किन्नर अखाड़ा की ओर से एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए किन्नर संत, साधु-संत और पदाधिकारी शामिल हुए। इस बैठक में आगामी सिंहस्थ 2028 की तैयारियों पर विस्तृत चर्चा की गई। संतों ने इस बात पर जोर दिया कि सिंहस्थ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आध्यात्मिक परंपरा और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
किन्नर संतों की बड़ी भागीदारी की तैयारी
बैठक में बताया गया कि सिंहस्थ 2028 में बड़ी संख्या में किन्नर संत उज्जैन पहुंचेंगे। वे पवित्र शिप्रा नदी में स्नान, आचमन और साधना करेंगे। लंबे समय बाद किन्नर समाज के संतों का इस तरह संगठित रूप में शिप्रा स्नान में शामिल होना समाज के लिए गौरव का विषय माना जा रहा है। इससे धार्मिक आयोजनों में किन्नर समाज की उपस्थिति और अधिक मजबूत होगी।
दो नए महामंडलेश्वर की घोषणा
बैठक के दौरान किन्नर अखाड़े में संगठनात्मक विस्तार भी किया गया। अखाड़े ने दो नए महामंडलेश्वर नियुक्त करने का निर्णय लिया। संतों का मानना है कि इससे अखाड़े की गतिविधियों को मजबूती मिलेगी और सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजन में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा।
किन्नर समाज को लेकर फैली भ्रांतियों पर प्रतिक्रिया
बैठक में किन्नर समाज को लेकर फैलाई जाने वाली भ्रांतियों पर भी चर्चा हुई। संतों ने कहा कि किन्नर समाज भी विविधता से भरा हुआ है और उसकी जड़ें सदियों से सनातन परंपरा और आध्यात्मिक संस्कृति से जुड़ी रही हैं। समाज को लेकर लगाए जाने वाले कई आरोपों को संतों ने निराधार बताया और कहा कि जरूरत पड़ने पर कानूनी कदम भी उठाए जाएंगे।
सामाजिक समरसता का संदेश देगा सिंहस्थ
संतों का मानना है कि सिंहस्थ 2028 में किन्नर अखाड़े की सक्रिय भागीदारी समाज में समानता और समरसता का संदेश देगी। यह आयोजन आध्यात्मिक परंपरा को मजबूत करने के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर जोड़ने का काम करेगा। उज्जैन की पावन धरती पर शिप्रा तट एक बार फिर आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का भव्य दृश्य प्रस्तुत करेगा।