SIR Controversy: SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने चुनाव आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट तरीके से जनता के सामने रखने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि अगर चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो आयोग की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों के साथ अपना पक्ष मजबूती से रखे, ताकि लोगों के मन में किसी तरह का संदेह न रहे। उनका बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
विपक्षी दलों ने प्रदर्शन का किया ऐलान
SIR को लेकर कांग्रेस ने देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन का कार्यक्रम बनाया है। पार्टी की ओर से राज्य इकाइयों को चुनाव आयोग के कार्यालयों तक मार्च और प्रदर्शन करने के निर्देश दिए गए हैं। दिल्ली में भी चुनाव आयोग के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन की तैयारी की गई है। अन्य विपक्षी दलों की ओर से भी SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग ने मतभेद के दावे पर दिया जवाब
यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद बढ़ा जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आंतरिक स्तर पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ने पिछले करीब 10 महीनों में कई मौकों पर टिप्पणियां दर्ज कीं। चुनाव आयोग ने जवाब देते हुए कहा कि किसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में चर्चा के दौरान अलग-अलग सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने यह भी कहा कि उसके सभी आधिकारिक फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम रहे हैं।
CEC के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में कांग्रेस
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्षी दलों के साथ मिलकर संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी की है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस संबंध में विपक्षी दलों से बातचीत की जा रही है और अगले दो सप्ताह के भीतर नोटिस दिए जाने की योजना है। प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने के लिए कानूनी विशेषज्ञों से भी सलाह ली जा रही है।
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत तय है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है। संसद में प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 और राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद जांच की प्रक्रिया होती है और दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं।