स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया में 2.89 करोड़ वोटर्स के नाम मतदाता सूची से कट गए हैं। जो कुल मतदाताओं का करीब 18-19 प्रतिशत है। देश में सबसे ज्यादा वोटर यूपी में हैं। यहां 403 विधानसभा और 80 लोकसभा सीट है। ऐसे में किसी भी तरह का संशोधन 2027 के विधानसभा चुनाव सहित आने वाले चुनावों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। ड्राफ्ट रिवीजन में सीट-वार वोटर डिलीशन का आधिकारिक ब्योरा जारी नहीं किया गया। लेकिन लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद, मेरठ और आगरा जैसे शहरी केंद्रों में हटाए गए नामों की संख्या राज्य में सबसे अधिक रही।
हार-जीत में कम अंतर वाली सीटों पर पड़ेगा असर
राजनीति के जानकारों का कहना है कि 2022 विधानसभा चुनाव में 53 ऐसी सीटें थीं, जहां पर हार-जीत का अंतर 5000 से कम था। 32 भाजपा और 21 सीट पर सपा ने जीत दर्ज की थी। कई सीटों पर जीत का अंतर केवल सैकड़ा या कुछ हजार वोटों का था, वहां 10 हजार वोटरों के नाम हटाए गए, जिससे चुनावी नतीजे बदलने की संभावना बढ़ गई है। उदाहरण के तौर पर बाराबंकी की रामनगर विधानसभा सीट पर सपा के फरीद महफूज किदवई ने भाजपा के शरद कुमार अवस्थी को 261 वोटों से हराया था। अब एसआईआर प्रक्रिया के बाद इस विधानसभा सीट पर 54435 वोट कट गए हैं। यदि अंतिम सूची में भी यही स्थिति रहती है, तो पूरा सियासी समीकरण बदल सकता है।
लोकसभा सीटों में भी यही पैटर्न दिखा
उदाहरण के तौर पर फर्रुखाबाद लोकसभा सीट पर जीत का अंतर करीब 2,600 वोट था, जबकि एसआईआर ड्राफ्ट में 3.4 लाख से अधिक नाम हटाए गए। पश्चिमी यूपी, अवध और पूर्वांचल की कम-मार्जिन सीटों पर अब राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।
सपा का आरोप- फॉर्म 7 का हो रहा दुरुपयोग
समाजवादी पार्टी का कहना है कि एसआईआर का प्रभाव उनके वोट बैंक पर असमान रूप से पड़ा है। एसआईआर प्रक्रिया में फॉर्म-7 के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने का दुरुपयोग किया गया। विशेष रूप से उन इलाकों में यह ज्यादा हुआ, जहां सपा का प्रदर्शन मजबूत रहा है। अखिलेश यादव का आरोप है कि बीजेपी से जुड़े कार्यकर्ता मुस्लिम, दलित और ओबीसी बहुल क्षेत्रों में डिलीशन फॉर्म का दुरुपयोग कर रहे हैं, जिससे कुछ सीटों पर 30 हजार से 50 हजार तक वोटरों के नाम हटाए गए।
मुस्लिम बहुल सीटें और एसआईआर
यह आशंका जताई गई कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम असमान रूप से हटाए गए हैं। हालाकि कई रिपोर्ट्स के अनुसार लखनऊ जैसे शहरी और बीजेपी-प्रभावित क्षेत्रों में भी सबसे ज्यादा वोटर डिलीशन हुआ, जिससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि केवल मुस्लिम इलाकों को ही निशाना बनाया गया। बावजूद विपक्षी दलों का कहना है कि अंतिम मतदाता सूची आने पर अल्पसंख्यक क्षेत्रों पर इसका असर साफ दिख सकता है, क्योंकि अभी तक सीट-वार आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं।
बीजेपी के लिए बन सकता है चुनौती
बीजेपी का कहना है कि हटाए गए नामों में बड़ी संख्या में मृत, डुप्लीकेट और अपात्र मतदाता थे, जिससे मतदाता सूची अधिक शुद्ध बनी है और चुनावों की वैधता मजबूत होगी। पार्टी ने छूटे हुए और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान भी शुरू किए हैं। हालांकि बीजेपी का मुख्य वोट बैंक शहरी क्षेत्रों में है और लखनऊ, गाजियाबाद जैसे महानगरों में सबसे ज्यादा वोटर डिलीशन हुआ, जो पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।
दलित-मुस्लिम वोटर पर असर
बीएसपी से जुड़ी सीटों पर एसआईआर के प्रभाव को लेकर सीमित जानकारी सामने आई है। दलित, मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटर संरचना में बदलाव से पार्टी पर असर पड़ सकता है। जैसे नगीना लोकसभा सीट पर इसका साफ असर देखने को मिलेगा। इस सीट पर दलित, मुस्लिम वोट निर्णायक साबित होते हैं। हालांकि इस वक्त नगीना लोकसभा सीट से आजाद समाज पार्टी से चंद्रशेखर आजाद सांसद हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें जबरदस्त जीत मिली थी।
टॉप 5 मेट्रो शहर में एसआईआर का प्रभाव
शहरी सीटें आमतौर पर सभी दलों के लिए कड़ी चुनौती होती हैं। एसआईआर के बाद लखनऊ में सबसे ज्यादा वोटर डिलीशन होने से बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकती है। गाजियाबाद में भारी वोटर कटौती से जीत का अंतर प्रभावित हो सकता है। कानपुर में मतदाता संख्या में बड़े स्तर पर संशोधन हुए हैं। मेरठ और आगरा शहरी मतदाता सूची में व्यापक बदलाव हुए हैं। ये शहर न सिर्फ जनसंख्या के लिहाज से अहम हैं, बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक रुझान तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कैंट लखनऊ से कटे एक लाख से ज्यादा वोट
अगर लखनऊ की बात करें तो कैंट विधानसभा से करीब एक लाख से ज्यादा वोट कटे हैं। इसी तरह से अलग-अलग विधानसभा से बड़ी संख्या में वोट कटे हैं। अगर शहरी वोट में ज्यादा फर्क आया तो नुकसान सत्ताधारी पार्टी को होगा। हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फाइनल वोटर लिस्ट आने का इंतजार करना चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश में एसआईआर आने के बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक समीकरण में बदलाव होंगे।