मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में दीपावली के दूसरे दिन एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां ग्राम लसूडिया परिहार में लगती है “सांपों की अदालत” — जहां सर्पदंश से पीड़ित लोग एकत्र होकर बताते हैं कि उन्हें क्यों सांप ने काटा। यह दृश्य न केवल अद्भुत होता है, बल्कि लोक आस्था और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक भी है। वैज्ञानिक पुष्टि भले न हो, लेकिन लोगों की आस्था इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।
सदियों पुरानी अनोखी परंपरा
सीहोर जिले के लसूडिया परिहार गांव में दीपावली के दूसरे दिन हनुमान मंदिर परिसर में यह अनोखी अदालत लगाई जाती है। यहां सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति आते हैं और बताते हैं कि किस परिस्थिति में उन्हें सांप ने डसा था। परंपरा के अनुसार, वे अपनी गलती स्वीकार करते हैं और यह संकल्प लेते हैं कि भविष्य में ऐसा आचरण नहीं करेंगे जिससे प्रकृति या जीव-जंतु को कष्ट पहुंचे।
सांप काटने के बाद यहां आता है निदान
स्थानीय लोगों का मानना है कि जो व्यक्ति यहां सच्चे मन से अपनी बात कहता है, उसे “सर्पदंश दोष” से मुक्ति मिलती है। कई श्रद्धालु बताते हैं कि इस स्थल पर आने के बाद उनके शरीर में सुधार हुआ और भय दूर हुआ। यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इस साल भी बड़ी संख्या में ग्रामीण और भक्त अदालत में शामिल हुए।
लोक आस्था और वैज्ञानिक नजरिया
वैज्ञानिक दृष्टि से इस परंपरा की पुष्टि नहीं है, लेकिन समाज में यह आस्था गहराई तक जमी हुई है। ग्रामीणों का विश्वास है कि यह प्रकृति से जुड़ा एक संवाद है—जो इंसान और जीव-जंतुओं के बीच संतुलन और सम्मान का संदेश देता है। दीपावली के बाद का यह आयोजन धार्मिकता और लोकविश्वास का अनूठा संगम बन गया है।