SP Rajya Sabha Industrialists History : समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए उद्योगपति धनराज नथवानी को उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद उनके नामांकन के दौरान मौजूद रहे, जिसके बाद विपक्षी दलों के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई। कई लोग इसे सपा की सामाजिक न्याय और पीडीए राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि पार्टी के पुराने फैसलों पर नजर डालें तो उद्योगपतियों को राज्यसभा भेजना उसके लिए कोई नया प्रयोग नहीं है।
सपा और उद्योगपतियों का पुराना रिश्ता
समाजवादी पार्टी के राजनीतिक इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब पार्टी ने कारोबारी और उद्योग जगत से जुड़े लोगों को राज्यसभा का टिकट दिया। पार्टी ने समय-समय पर ऐसे चेहरों पर भरोसा जताया, जिन्हें राजनीतिक से ज्यादा कॉर्पोरेट जगत में पहचान मिली। यही वजह है कि धनराज नथवानी की उम्मीदवारी को सपा की पुरानी रणनीति का विस्तार माना जा रहा है।
संजय डालमिया रहे शुरुआती बड़े नाम
उद्योगपतियों को राज्यसभा भेजने की शुरुआत सपा ने संजय डालमिया के साथ की थी। संजय डालमिया दिसंबर 1994 से जुलाई 1998 तक राज्यसभा सदस्य रहे। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, वह पार्टी के शुरुआती दौर में महत्वपूर्ण सहयोगियों में गिने जाते थे। सपा के विस्तार के समय उनका नाम पार्टी से जुड़े प्रमुख उद्योगपतियों में शामिल रहा।
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अमर सिंह ने बनाई अलग पहचान
सपा और उद्योग जगत के रिश्तों की चर्चा अमर सिंह के बिना अधूरी मानी जाती है। उद्योग जगत से राजनीति में आए अमर सिंह 1996 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे। इसके बाद 2002 और 2008 में भी उन्हें सपा ने राज्यसभा भेजा। पार्टी और कॉर्पोरेट जगत के बीच सेतु की भूमिका निभाने वाले नेताओं में उनका नाम प्रमुख रहा। हालांकि बाद में उनके और सपा के रिश्तों में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला।
अनिल अंबानी और संजय सेठ भी बने सांसद
साल 2004 में उद्योगपति अनिल अंबानी भी समाजवादी पार्टी के समर्थन से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा पहुंचे थे। इसके बाद 2016 में रियल एस्टेट कारोबारी संजय सेठ को सपा ने राज्यसभा उम्मीदवार बनाया। संजय सेठ पार्टी के कोषाध्यक्ष भी रह चुके थे। बाद में उन्होंने सपा छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और वर्तमान में भी राज्यसभा सदस्य हैं।
धनराज नथवानी की उम्मीदवारी क्यों खास?
धनराज नथवानी की उम्मीदवारी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उनके परिवार का संबंध दूसरे राजनीतिक दलों से भी जुड़ा रहा है। उनके पिता पिरामल नथवानी झारखंड से राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। ऐसे में सपा का यह फैसला राजनीतिक और रणनीतिक दोनों नजरियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्यसभा चुनाव के बाद इस फैसले का राजनीतिक असर किस रूप में सामने आता है।