प्रदेश के 762 नगरीय निकाय अपनी नियमित आय बढ़ाने के लिए कर वसूली करते हैं, लेकिन वर्षों से जमा नहीं हुआ बकाया अब भी बड़ी समस्या बना हुआ है। स्थिति यह है कि पुराने गृहकर, जलकर और सीवरकर की रकम निकालने के लिए सरकार को एक बार फिर ब्याज और सरचार्ज छोड़ने का रास्ता अपनाना पड़ रहा है। यानी नियमित वसूली से जो रकम समय पर नहीं आई, उसे अब छूट देकर मूल बकाया के रूप में जुटाने की कोशिश होगी। नगर विकास विभाग के 20 जुलाई 2026 के शासनादेश के मुताबिक 15 अगस्त से 15 दिसंबर तक एकमुश्त समाधान योजना लागू की जाएगी।
नियमित कर संग्रह की कमजोरी का सवाल खत्म नहीं होता
यह स्थिति नगरीय निकायों की राजस्व व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। प्रदेश में 17 नगर निगम, 200 नगर पालिका परिषद और 545 नगर पंचायतें हैं। इतने बड़े निकाय तंत्र के बावजूद कर बकाये का लगातार जमा होते रहना बताता है कि कर निर्धारण से लेकर वसूली तक की नियमित व्यवस्था में अभी सुधार की गुंजाइश है। बकाया बढ़ने के बाद राहत योजना लाकर रकम निकालना तत्काल समाधान हो सकता है, लेकिन इससे नियमित कर संग्रह की कमजोरी का सवाल खत्म नहीं होता।
बकायेदार मूल रकम तीन किस्तों में जमा कर सकेंगे
योजना के तहत एक अप्रैल 2026 तक के लंबित गृहकर, जलकर और सीवरकर पर ब्याज और सरचार्ज में 100 प्रतिशत छूट दी जाएगी। बकायेदार मूल रकम तीन किस्तों में जमा कर सकेंगे। पहली किस्त योजना लागू होने के 30 दिन के भीतर और शेष दो किस्तें अगले दो महीनों में जमा करनी होंगी। सभी 762 निकायों में पहले महीने विशेष प्रचार अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं।
अपनी आय के लिए बार-बार राहत का सहारा
नगरीय निकायों की आर्थिक मजबूती काफी हद तक उनकी अपनी आय पर निर्भर करती है। सड़क, सफाई, पेयजल, जल निकासी और स्ट्रीट लाइट जैसी सेवाओं के लिए उन्हें लगातार धन की जरूरत होती है। ऐसे में कर वसूली से मिलने वाला राजस्व समय पर नहीं मिलना सीधे उनकी वित्तीय क्षमता को प्रभावित करता है। पुराने बकाये की बड़ी रकम लंबे समय तक अटकी रहने के बाद ओटीएस लाना इस बात का संकेत है कि केवल कर मांग जारी करना पर्याप्त नहीं है, उसकी प्रभावी वसूली भी जरूरी है। नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा ने कहा कि ओटीएस का उद्देश्य पुराने बकाये और उनसे जुड़े विवादों का समाधान कर निकायों की आर्थिक स्थिति मजबूत करना है। उनके मुताबिक बकाया मिलने से सड़क, पेयजल, जल निकासी, सफाई और प्रकाश जैसी सुविधाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध होंगे। सरकार निकायों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही है।
छूट देकर रकम निकालना स्थायी इलाज नहीं
ओटीएस से सरकार को पुराने बकाये की वसूली में मदद मिल सकती है, लेकिन असली सवाल इसके बाद का है। यदि हर कुछ वर्षों में बकाये को निकालने के लिए ब्याज-सरचार्ज माफी की जरूरत पड़ती है तो नियमित वसूली व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल बना रहेगा। निकायों की आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी है कि कर का निर्धारण, मांग और संग्रह समय पर हो। पुराने बकाये को छूट देकर निकालना एक बार की कवायद हो सकती है, लेकिन इसे नियमित राजस्व व्यवस्था का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।