मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच पूरी दुनिया की नजर एक समुद्री रास्ते पर टिक गई है, जिसे स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज कहा जाता है। यह वही संकरा रास्ता है, जहां से रोजाना करीब डेढ़ से दो करोड़ बैरल कच्चा तेल दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने इस मार्ग को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। अगर यहां जरा भी रुकावट आती है, तो उसका असर सीधे तेल की कीमतों पर पड़ता है।
कहां है और क्यों इतना अहम है यह मार्ग
स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई करीब 33 किलोमीटर है, लेकिन रणनीतिक रूप से यह बेहद अहम है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन भी कहा जाता है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है
भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। इसमें से लगभग आधा तेल इसी समुद्री रास्ते से होकर आता है। यानी अगर यहां कोई रुकावट होती है, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ सकता है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देश भी इसी मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं।
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कौन-कौन देश करते हैं निर्यात
इस रास्ते से सऊदी अरब, इराक, यूएई, ईरान, कुवैत और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादक देश अपना तेल बाहर भेजते हैं। सऊदी अरब का हिस्सा सबसे ज्यादा माना जाता है। अगर किसी वजह से शिपिंग प्रभावित होती है, तो इन देशों की सप्लाई पर सीधा असर पड़ सकता है और वैश्विक बाजार में कमी महसूस हो सकती है।
तेल की कीमतों में उछाल
हाल के हमलों और तनाव के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई है। कुछ ही दिनों में कीमतों में करीब 10 से 12 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई। बाजार को डर है कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो सप्लाई बाधित हो सकती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो रहा है।
आगे क्या हो सकता है असर
अगर संघर्ष और बढ़ता है और इस समुद्री रास्ते पर आवाजाही प्रभावित होती है, तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहेगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा का अहम केंद्र बना हुआ है।