Lal Peda : उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर अपनी पारंपरिक खान-पान की वजह से भी खास पहचान रखता है. यहां बाटी-चोखा जैसे देसी व्यंजनों के साथ एक ऐसी मिठाई भी लोगों के बीच लोकप्रिय है, जिसका स्वाद और बनाने का तरीका इसे दूसरी मिठाइयों से अलग बनाता है। यह मिठाई है सुल्तानपुर का मशहूर लाल पेड़ा.
घंटों भुना जाता है मावा
लाल पेड़े की खासियत इसकी तैयारी में छिपी है. इसे बनाने के लिए मावा यानी खोया लिया जाता है और उसे धीमी आंच पर काफी देर तक भुना जाता है। मावा जितनी देर तक पकता और भुनता है, उसका रंग धीरे-धीरे गहरा होता जाता है. इसी प्रक्रिया के बाद पेड़े को उसका खास लाल-भूरा रंग और अलग स्वाद मिलता है.
धीमी आंच पर पकाने से बढ़ता है स्वाद
इस मिठाई को तैयार करने में जल्दबाजी नहीं की जाती। मावे को लगातार चलाते हुए धीमी आंच पर पकाया जाता है, ताकि वह नीचे से जले नहीं और अच्छी तरह भुन सके. लंबे समय तक भुनने से मावे की नमी कम होती है और उसमें एक खास तरह की खुशबू और स्वाद विकसित होता है.
साधारण सामग्री से तैयार होती है मिठाई
लाल पेड़ा बनाने में आमतौर पर मावा, चीनी और स्वाद के अनुसार इलायची जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. तैयार मिश्रण को कुछ देर ठंडा करने के बाद छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर पेड़े का आकार दिया जाता है. इसकी सतह पर हल्की दरारें और गहरा रंग इसे देखने में भी आकर्षक बनाते हैं.
स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वालों में भी पसंद
सुल्तानपुर आने वाले लोग यहां की स्थानीय मिठाइयों का स्वाद लेना पसंद करते हैं. लाल पेड़ा खास तौर पर उन लोगों का ध्यान खींचता है, जो पारंपरिक तरीके से बनी मिठाइयों को पसंद करते हैं. इसकी खास तैयारी और भुने मावे का स्वाद इसे सामान्य पेड़े से अलग अनुभव देता है.
सुल्तानपुर की खान-पान की पहचान
सुल्तानपुर की पहचान केवल किसी एक व्यंजन तक सीमित नहीं है. यहां के स्थानीय स्वाद में देसी पकवानों और पारंपरिक मिठाइयों की अपनी जगह है. बाटी-चोखा के साथ लाल पेड़ा भी शहर की खान-पान की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि इस मिठाई का नाम आते ही सुल्तानपुर की याद लोगों के जेहन में आ जाती है.