Supreme Court Comments: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि काश न्यायाधीशों, खासकर हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति भी चुनाव आयुक्तों की तरह तेजी से हो पाती। यह टिप्पणी जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान की।
नियुक्तियों में जल्दबाजी का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि विपक्ष के नेता से प्रभावी परामर्श किए बिना चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां जल्दबाजी में की गईं। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेता को 200 नामों की सूची दी गई और अगले ही दिन चयन समिति की बैठक कर नियुक्तियों का फैसला ले लिया गया।
केंद्र सरकार पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान यह भी आरोप लगाया गया कि अदालत में मामले की सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने तेजी दिखाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर दी। हालांकि अदालत ने इस दलील पर तुरंत सहमति नहीं जताई और कहा कि किसी भी मकसद का आरोप लगाने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं।
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कोर्ट ने मांगे ठोस प्रमाण
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने पूछा कि क्या ऐसा कोई प्रमाण है जिससे साबित हो कि केंद्र सरकार को सुनवाई की तारीख की पहले से जानकारी थी और उसी वजह से नियुक्तियां जल्द की गईं। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से माना गया कि उनके पास इस दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री नहीं है।
14 मई को होगी अगली सुनवाई
मामले की सुनवाई फिलहाल जारी है और सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अगली तारीख 14 मई तय की है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अदालत आगे इस कानून और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर क्या रुख अपनाती है।