New Aravalli Region: अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाते हुए पांच सदस्यीय हाई-लेवल एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है। यह समिति तय करेगी कि अरावली पहाड़ियों की वैज्ञानिक और भौगोलिक परिभाषा क्या होनी चाहिए तथा किन क्षेत्रों को इसके दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। अदालत का मानना है कि पर्यावरण से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विशेषज्ञों की राय के बिना निर्णय लेना उचित नहीं होगा।
31 अगस्त तक रिपोर्ट सौंपेगी समिति
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने समिति को 31 अगस्त तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी। समिति अरावली क्षेत्र की वर्तमान सीमाओं, भूगोल और पर्यावरणीय महत्व का अध्ययन कर अपनी सिफारिशें देगी।
कौन-कौन हैं समिति के सदस्य?
इस विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के महानिदेशक करेंगे। समिति में वन, भूविज्ञान, पर्यावरण और जैव विविधता के क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। इसके अलावा कुछ विशेषज्ञों को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में भी जोड़ा गया है, ताकि अध्ययन व्यापक और वैज्ञानिक आधार पर किया जा सके।
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मौजूदा नियमों की होगी समीक्षा
फिलहाल लागू नियमों के अनुसार दो अरावली पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से अधिक दूरी होने पर बीच का क्षेत्र अरावली का हिस्सा नहीं माना जाता। सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है कि इससे संरक्षित क्षेत्र का दायरा सीमित हो सकता है और कई इलाकों में खनन तथा अन्य गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। समिति यह भी जांच करेगी कि वर्तमान मानदंडों के कारण कहीं बड़ी संख्या में पहाड़ियां संरक्षण से बाहर तो नहीं रह गई हैं।
पर्यावरणीय नुकसान रोकना लक्ष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अवैध खनन, अनियंत्रित निर्माण और पर्यावरणीय क्षरण पर रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में अरावली संरक्षण से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव संभव हैं, जिससे इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी।