Mamata government big bet: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद के बीच ममता बनर्जी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई से ठीक पहले राज्य सरकार ने 8,505 अधिकारियों की तैनाती पर सहमति जता दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब चुनाव आयोग लगातार अधिकारियों की कमी का मुद्दा उठा रहा था और मामला शीर्ष अदालत में विचाराधीन है।
तीन महीने बाद क्यों बदला रुख
SIR प्रक्रिया की शुरुआत पिछले साल नवंबर में हुई थी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने शुरू से ही इसका विरोध किया। चुनाव आयोग का आरोप रहा कि राज्य सरकार पर्याप्त सहयोग नहीं कर रही और जरूरी अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए गए। करीब तीन महीने बाद, जब सुनवाई निर्णायक मोड़ पर है, तब सरकार का यह कदम राजनीतिक और कानूनी दोनों नजरियों से अहम माना जा रहा है।
चुनाव आयोग की पुरानी आपत्ति
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कई बार कहा था कि SIR के लिए मांगे गए अधिकारी समय पर नहीं दिए गए। आयोग का तर्क था कि प्रक्रिया में देरी और अव्यवस्था की एक बड़ी वजह यही रही। अब राज्य सचिवालय नबन्ना की ओर से आयोग को लिखित सूचना दी गई है कि 8,505 बी-ग्रेड अधिकारी उपलब्ध कराए जाएंगे।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, दबाव बढ़ा
हाल की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि दो भाषाएं जानने वाले कर्मचारियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए। ममता बनर्जी ने अदालत में दावा किया था कि राज्य ने जरूरत के मुताबिक अधिकारी दिए हैं और जिलों की संख्या सीमित होने के कारण संख्या कम है। इसके बावजूद अदालत की टिप्पणियों के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
तृणमूल कांग्रेस लगातार SIR को लेकर चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाती रही है और इसे NRC से जोड़कर देखती है। वहीं भाजपा का कहना है कि आखिरी वक्त पर अधिकारियों की पेशकश यह स्वीकारोक्ति है कि अब तक सहयोग नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले लिए गए इस फैसले ने पूरे मामले को और भी राजनीतिक रंग दे दिया है।