न्याय सिर्फ कानून की धाराओं से नहीं, बल्कि हालात और मानवीय संवेदनाओं से भी निकलता है—यह बात सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले ने साबित कर दी। सहमति से बने रिश्ते को लेकर दर्ज हुए रेप केस में दस साल की सजा काट रहे युवक को शीर्ष अदालत ने राहत दी। कोर्ट ने मामले को गलतफहमी का नतीजा मानते हुए सजा, दोषसिद्धि और शिकायत तीनों खत्म कर दीं।
दोस्ती से रिश्ते तक की कहानी
यह मामला वर्ष 2015 में शुरू हुई दोस्ती से जुड़ा है, जो धीरे-धीरे प्रेम संबंध में बदली। दोनों के बीच सहमति से रिश्ता बना और शादी की बात भी तय थी। परिवारों को इस संबंध पर कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन समय के साथ विवाह में देरी हुई, जिससे युवती के मन में असुरक्षा और भ्रम पैदा हुआ।
गलतफहमी ने लिया कानूनी रूप
शादी टलने के कारण 2021 में युवती ने युवक के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया। ट्रायल कोर्ट ने शिकायत के आधार पर युवक को दोषी ठहराते हुए दस साल की सजा सुना दी। हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की ‘छठी इंद्री’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टि से देखने का फैसला किया। अदालत ने दोनों पक्षों और उनके परिवारों को व्यक्तिगत रूप से बुलाया। बातचीत से यह साफ हुआ कि रिश्ता सहमति पर आधारित था और विवाद की जड़ गलतफहमी थी, न कि जबरदस्ती।
शादी की अनुमति, फिर केस खत्म
जब दोनों ने विवाह की इच्छा जताई और परिवार भी सहमत हुए, तो कोर्ट ने विशेष जमानत दी। शादी सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शिकायत, सजा और दोषसिद्धि को समाप्त कर दिया।
नौकरी भी हुई बहाल
युवक की सरकारी नौकरी केस के चलते प्रभावित हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने निलंबन रद्द करने और पूरा वेतन देने का आदेश भी दिया। यह फैसला न्याय के उस रूप को दर्शाता है, जहां कानून के साथ इंसानियत को भी बराबर महत्व मिला।