Supreme Court on Cancer Drug Prices: कैंसर की महंगी दवाओं और उनके दाम तय करने के तरीकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से सख्त सवाल पूछे हैं। खासतौर पर प्राइस टू रिटेलर और बिक्री मूल्य में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल दागे। अदालतों की इन टिप्पणियों का सीधा असर देश के लाखों कैंसर पीड़ितों और उनके परिवार पर पड़ सकता है, जिन्हें इलाज के लिए भारी-भरकम खर्च से आर्थिक तंगी झेलनी पड़ती है।
मूल्य नियंत्रण पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं के असली मूल्य और उनके बिक्री मूल्य के बीच भारी अंतर पर हैरानी जताई है। जस्टिस संदीप मेहता ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस कैंसर की दवा की रिटेलर कीमत करीब 3000 रुपये होती है, उस पर 27000 रुपये तक छाप दी जाती है। बेंच ने कहा कि आखिर ऐसी जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर कैसे रखा जा सकता है।
अस्पतालों की मनमानी
इसके अलावा कोर्ट ने पूछा कि जब हर दवा और मेडिकल उपकरण आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आता है, तो जीवनरक्षक कैंसर दवाओं को DPCO यानि सरकारी मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से बाहर क्यों रखा गया है? पीठ ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों को अकसर अपनी इन-हाउस फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए कहते हैं।
टैक्सपेयर के पैसे का इस्तेमाल
पीठ ने सवाल उठाया कि जब सरकारी योजनाओं के तहत मरीजों का इलाज होता है, तो इन अति महंगी दवाओं की महंगी कीमत का भुगतान कौन करता है? टैक्सपेयर ही भरता है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि 16% का एक समान मानदंड क्यों नहीं हो सकता और इसके ऊपर कुछ भी क्यों हो?
सरकार की ओर से जवाब
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर कोई रास्ता निकालना जरूरी है और एक ऐसा समाधान खोजना होगा जो सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अब अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को करेगा।
सुनवाई से पहले ही पीड़िता की मौत
केरल हाई कोर्ट ने जून 2022 में एक कैंसर पीड़िता द्वारा याचिका पर फैसला सुनाते हुए सरकार को पेटेंट कानून के तहत वाले अधिकारों की याद दलाई। इस मामले की 57 बार सुनवाई टलने के कारण फैसला आने से पहले ही याचिकाकर्ता की मौत हो गई।
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सरकार को सस्ती दवाएं तैयार करके बांटने का अधिकार
इस मामले में सोमवार को अदालत ने कहा कि पेटेंट्स एक्ट के तहत केंद्र सरकार के पास शक्ति है कि वह जीवन रक्षक दवाएं तैयार कर सके। सरकार इन दवाओं को बिना किसी कमर्शियल प्रॉफिट के जरूरतमंद मरीजों को रियायती या उचित दरों पर उपलब्ध करा सकती है। हार्ट कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार लाइव सेविंग मेडिसिन तैयार कर सकती है। वह ऐसा करने के लिए किसी कंपनी को भी आदेश दे सकती है. इसके अलावा जरूरतमंद मरीजों को बिना किसी लाभ के उन्हें दे सकती है।