CJP Protest : दिल्ली के जंतर-मंतर समेत देश के कई हिस्सों में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई की जांच कर रही हाई पावर्ड कमेटी में बदलाव की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि समिति के सदस्यों की निष्पक्षता पर लगाए गए आरोप केवल अनुमान और कल्पना पर आधारित हैं, जिनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया।
छात्र प्रदर्शनों की जांच के लिए बनी थी समिति
जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे थे। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय हाई पावर्ड कमेटी का गठन किया था। समिति को पूरे घटनाक्रम, पुलिस अधिकारियों की भूमिका और सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
प्रशांत भूषण ने उठाए थे सवाल
मामले की पिछली सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने समिति के पुनर्गठन की मांग की थी। उनका तर्क था कि समिति में शामिल एक पूर्व डीजीपी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं क्योंकि उनके कुछ अधिकारियों से करीबी संबंध बताए गए, जो जांच के दायरे में आ सकते हैं। इसी आधार पर समिति में बदलाव की मांग की गई थी।
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कोर्ट बोला- बिना सबूत सवाल उठाना उचित नहीं
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अपने लिखित आदेश में कहा कि समिति का गठन गहन विचार-विमर्श के बाद किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब समिति एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की निगरानी में काम कर रही है, तब बिना किसी विश्वसनीय आधार के उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि समिति को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए।
अंतरिम रिपोर्ट भी देगी समिति
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच समिति समय-समय पर अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। इन रिपोर्टों के आधार पर अदालत आवश्यकता पड़ने पर आगे के निर्देश जारी कर सकती है। इससे जांच प्रक्रिया पर न्यायिक निगरानी बनी रहेगी।
गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा पर भी जोर
अदालत ने समिति को निर्देश दिया है कि जांच के दौरान पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही समिति से कहा गया है कि वह जांच पूरी कर जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करे। इस फैसले के साथ फिलहाल हाई पावर्ड कमेटी की संरचना में किसी बदलाव की संभावना खत्म हो गई है।