Supreme Court Reservation Verdict : धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया कि हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल धर्म बदलने के आधार पर पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) यानी बीसीएम श्रेणी में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। यह फैसला तमिलनाडु सरकार की उस नीति से जुड़े मामले में आया, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी। अदालत के इस फैसले ने धर्म, जाति और आरक्षण से जुड़े नियमों पर नई चर्चा शुरू कर दी है।
तमिलनाडु सरकार के आदेश पर क्यों हुआ विवाद
यह मामला तमिलनाडु सरकार के 2024 के एक आदेश से जुड़ा है। इसके तहत कुछ पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को बीसीएम श्रेणी में प्रमाणपत्र देने का रास्ता बनाया गया था। सरकार का कहना था कि धर्म बदलने के कारण सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इस आदेश को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
मद्रास हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया था
मद्रास हाई कोर्ट ने 25 जून 2026 को तमिलनाडु सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत का मानना था कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को बीसीएम श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। आरक्षण का लाभ पाने के लिए संबंधित श्रेणी के नियमों और पात्रता की शर्तों को पूरा करना जरूरी है। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बरकरार रखा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत के मुताबिक, हिंदू सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा पिछड़ेपन का आधार दूसरे धर्म में जाने के बाद अपने आप दूसरी आरक्षण श्रेणी में लागू नहीं हो जाता। यानी सिर्फ धर्म बदलने से किसी दूसरी श्रेणी का प्रमाणपत्र या आरक्षण पाने का अधिकार नहीं मिल जाता।
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आम लोगों पर क्या होगा इसका असर
इस फैसले से धर्म परिवर्तन और आरक्षण की पात्रता को लेकर कानूनी स्थिति पर फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति का हर तरह का आरक्षण अपने आप खत्म हो जाता है। आरक्षण का लाभ संबंधित कानून, समुदाय की श्रेणी और पात्रता के नियमों पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी मामले में फैसला लेने से पहले लागू नियमों को समझना जरूरी है।