बिहार में SIR को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिशा में पहुंच गया है। बुधवार को अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने का अधिकार है और इसमें कोई संवैधानिक खामी नहीं पाई गई। इस फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। साथ ही बिहार की राजनीति में भी इसकी चर्चा तेज हो गई है।
क्या था पूरा विवाद
दरअसल कई याचिकाओं में यह दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत चुनाव आयोग को इतने बड़े स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची में बड़े बदलाव हो सकते हैं और इससे चुनावी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
#WATCH | Delhi: Petitioner and Advocate Ashwini Upadhyay says, "... The Supreme Court has accepted the arguments put forth by the Election Commission; it has also accepted the arguments that we presented. Furthermore, regarding the more than 20 PILs filed by the opposition, in… https://t.co/1B94nBxFRv pic.twitter.com/6N1JeLk42L
— ANI (@ANI) May 27, 2026
किन लोगों ने दी चुनौती
इस मामले में कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिका दाखिल की थी। इनमें कई सामाजिक संगठन और विपक्ष से जुड़े नेता शामिल थे। उनका कहना था कि SIR प्रक्रिया की सीमा और अधिकारों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान इस मुद्दे पर कई कानूनी तर्क भी रखे गए और लंबे समय तक बहस चली।
कोर्ट ने क्या कहा
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर काम किया है। अदालत ने माना कि SIR की प्रक्रिया में सभी नियमों का पालन किया गया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह वैध है और इसमें किसी प्रकार की कानूनी कमी नहीं दिखती।
चुनाव आयोग को बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर स्थिति साफ हो गई है। अदालत ने माना कि वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण और जांच जैसे मामलों में आयोग के अधिकार बरकरार हैं। इससे आयोग को भविष्य में भी ऐसी प्रक्रियाएं लागू करने में कानूनी मजबूती मिलेगी।
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अब राजनीति में नया दौर
इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो सकती है। विपक्ष जहां इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है, वहीं सत्तापक्ष इसे बड़ी जीत के तौर पर पेश कर सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।