.jpg%3Falt%3Dmedia%26token%3D0acb4353-e14d-466d-ac8f-c450c981a421&w=3840&q=75)
Supreme Court Strict: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक दलों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब लाखों मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से हटा दिए गए हैं, तब राजनीतिक दल आपत्तियां दर्ज कराने में सक्रिय क्यों नहीं हैं। जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सवाल उठाया कि 12 मान्यता प्राप्त दलों में से केवल तीन ही अदालत में मौजूद हैं। कोर्ट ने तीखे शब्दों में कहा कि “बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) नियुक्त करने के बाद ये दल क्या कर रहे हैं? जनता और स्थानीय राजनीतिक व्यक्तियों के बीच यह दूरी क्यों है?”
बीएलए की भूमिका और दलों की चुप्पी
सुनवाई में चुनाव आयोग ने बताया कि राज्यभर में करीब 1.6 लाख बीएलए नियुक्त किए गए हैं। अगर प्रत्येक बीएलए रोज़ 10 लोगों से मिलता है, तो लगभग 16 लाख मतदाताओं तक पहुंचा जा सकता है। आयोग का कहना है कि बड़ी राजनीतिक पार्टियां कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कर रहीं और यह सहयोग की कमी दर्शाता है। आयोग की ओर से वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि जिनके नाम सूची से हटे हैं, वे ऑनलाइन दावा दायर कर सकते हैं और इसके लिए बिहार आने की भी आवश्यकता नहीं है।
यह भी देखेंःOnline Gaming Bill Passed: Dream11 का खेल खत्म, ऑनलाइन गेमिंग बिल पास, 28 करोड़ यूजर्स पर पड़ा असर
विपक्षी दलों की दलील और कोर्ट के सवाल
आरजेडी की ओर से कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि वे केवल सांसद मनोज झा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, पूरी पार्टी का नहीं। वहीं, अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि उनकी याचिका में आठ विपक्षी दल शामिल हैं। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने उनसे पूछा कि यदि इतने दल जुड़े हैं तो कितनी आपत्तियां दायर की गईं और कितने बीएलए वास्तव में सक्रिय हैं। कोर्ट ने राजनीतिक दलों की निष्क्रियता को गंभीर मानते हुए कहा कि मतदाताओं को सहायता करना उनकी जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग ने भी स्पष्ट किया कि पता बदलने या परिवार में मृत्यु जैसी स्थितियों की जानकारी देना व्यक्तिगत मतदाता का दायित्व है, लेकिन राजनीतिक दलों का सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।