आई-पैक छापेमारी मामले में आज सर्वोच्च न्यायालय में अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि केंद्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाई में राज्य सरकार की ओर से दखल देने की कोशिश हुई। यह टिप्पणी ममता बनर्जी सरकार के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है। अदालत की सख्त टिप्पणियों से साफ संकेत मिला कि मामला सिर्फ छापेमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज से भी जुड़ा है।
केंद्र की ओर से लगाए गए गंभीर आरोप
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले में मुख्यमंत्री स्वयं आरोपी की भूमिका में हैं। उन्होंने दावा किया कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और दफ्तर से अहम फाइलें व दस्तावेज ले जाए गए। तुषार मेहता ने इसे जांच में सीधा हस्तक्षेप बताया, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
ईडी अधिकारियों पर दर्ज मामलों पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज चार प्राथमिकी की कार्रवाई पर रोक लगा दी। अदालत ने साफ कहा कि राज्य सरकार या उसकी एजेंसियों को केंद्रीय जांच में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट की इस टिप्पणी को कानून के शासन की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है। इससे ममता सरकार की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं।
ममता सरकार और पुलिस से जवाब तलब
अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य पुलिस प्रशासन से इस पूरे मामले पर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि मामले से जुड़े सभी तथ्यों की गहन जांच जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और किसी भी तरह की अनदेखी न हो।
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शीर्ष पुलिस अधिकारियों पर लटकी तलवार
इस मामले में बंगाल के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस आयुक्त मनोज वर्मा के निलंबन की मांग भी उठी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों से राय मांगी है। इससे साफ है कि अदालत इस पूरे मामले को बेहद गंभीर मान रही है और किसी भी स्तर पर जवाबदेही तय करना चाहती है।
सीसीटीवी और सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल पुलिस को घटनास्थल से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि आगे की सुनवाई में किसी भी साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने यह भी दोहराया कि न तो केंद्रीय एजेंसियों को राजनीतिक गतिविधियों में दखल देना चाहिए और न ही राज्य सरकार को जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार है। यह मामला अब ममता सरकार के लिए कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।