सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता पर कथित हमले के मामले में शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि पीड़ित के सिर पर लगी गंभीर चोटों को देखते हुए प्राथमिकी (FIR) में भारतीय न्याय संहिता के तहत ‘हत्या की कोशिश’ और ‘गंभीर चोट’ से संबंधित धाराएं जोड़ी जानी चाहिए थीं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच स्थानीय पुलिस से लेकर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपने का निर्देश दिया।
सिर पर गंभीर चोट के बावजूद हल्की धाराएं लगाने पर सवाल
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि शरीर के संवेदनशील हिस्से, विशेषकर सिर पर गंभीर चोट लगने के मामलों में शुरुआती स्तर पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज करने पर विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलेगा, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर गंभीर धाराएं जोड़ना आवश्यक था।
जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि स्थानीय पुलिस समझौते का दबाव बना रही है। इसे ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपने का निर्देश दिया। अदालत ने इन निर्देशों के साथ अधिवक्ता पंकज शर्मा की याचिका का निस्तारण कर दिया। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि गंभीर चोटों के बावजूद पुलिस ने मामले को सामान्य मारपीट की तरह दर्ज किया।
पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
याचिका में आरोप लगाया गया कि घटना के बाद पुलिस ने पहले एफआईआर दर्ज करने में देरी की और बाद में गंभीर धाराएं भी शामिल नहीं कीं। यह भी दावा किया गया कि आरोपियों की ओर से समझौते का दबाव बनाया गया और पीड़ित परिवार को कथित रूप से धमकियां भी दी गईं। मामले की सुनवाई के दौरान भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि उन्होंने इस संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बात की है और पीड़ित की सरकारी अस्पताल में चिकित्सकीय जांच कराने के निर्देश दिए हैं।
11 जुलाई की घटना से जुड़ा है मामला
याचिका के अनुसार, 11 जुलाई को अधिवक्ता पंकज शर्मा पर उनके दिल्ली स्थित घर के भीतर कथित रूप से कई लोगों ने हमला किया। आरोप है कि हमलावरों ने उनका सिर लोहे के गेट से कई बार टकराया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं और आठ टांके लगाने पड़े। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि हमलावर प्रभावशाली लोग हैं और घटना के बाद भी परिवार को धमकाने की कोशिश की गई। उन्होंने मामले में पुलिस सुरक्षा, निष्पक्ष जांच और भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएं जोड़ने की मांग की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश जारी किए।