Digital Arrest: डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों से करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले गिरोहों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने ऐसे अपराधों को ‘डिजिटल डकैती’ बताते हुए कहा कि बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों को निशाना बनाने वालों से सख्ती से निपटने की जरूरत है। 28 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान जमानत और मुकदमे से पहले सजा को लेकर कड़ी मौखिक टिप्पणियां कीं। हालांकि, इन टिप्पणियों का मतलब यह नहीं है कि सभी आरोपियों की जमानत पर स्वतः प्रतिबंध लग गया है। <Cite refs=
12 राज्यों में 35 मामलों से जुड़ा विवाद
सुप्रीम कोर्ट में दो आरोपियों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी। उनके खिलाफ 12 राज्यों में साइबर अपराध से जुड़े 35 मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई। आरोप था कि उनकी कंपनी के बैंक खाते का इस्तेमाल कथित ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए किया गया। आरोपियों ने सभी मामलों की सुनवाई एक जगह कराने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। बाद में याचिका वापस ले ली गई। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में पीड़ितों और जांच एजेंसियों के हितों को प्राथमिकता देना जरूरी है।
81 वर्षीय बुजुर्ग से 1.90 करोड़ रुपये की ठगी
सुनवाई के दौरान केरल के एर्नाकुलम में रहने वाले 81 वर्षीय बुजुर्ग के साथ कथित तौर पर हुई 1.90 करोड़ रुपये की ठगी का मामला भी सामने आया। बताया गया कि ठगी की रकम आरोपियों से जुड़े म्यूल बैंक खातों में पहुंची थी। म्यूल खाते वे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल साइबर ठगी से प्राप्त धन को लेने या दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है। मुख्य न्यायाधीश ने ऐसे अपराधों पर चिंता जताते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की जीवनभर की कमाई को निशाना बनाने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
जमानत पर रोक को लेकर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि कानून इसकी अनुमति देता है, तो डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों में आरोपियों को जमानत देने और उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में जमानत के आदेशों को चुनौती देने पर विचार किया जा सकता है। अदालत की ये मौखिक टिप्पणियां हैं, अपने आप में कोई नया कानून नहीं। आरोपियों की जमानत का फैसला संबंधित मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही होगा।
आठ महीने में 647 करोड़ रुपये की ठगी
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, जनवरी से अगस्त 2026 के बीच देश में डिजिटल अरेस्ट से संबंधित 21,900 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं और 647 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी की जानकारी सामने आई। वर्ष 2024 में ऐसी 1,23,672 शिकायतों के साथ करीब 1,935 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई थी, जबकि 2025 में 58,239 शिकायतों में लगभग 1,211 करोड़ रुपये की रकम ठगे जाने की सूचना थी। ये आंकड़े साइबर अपराध की गंभीरता को दर्शाते हैं।
बैंकिंग व्यवस्था और जांच पर भी ध्यान
डिजिटल ठगी रोकने के लिए संदिग्ध बैंक खातों की पहचान, केवाईसी सत्यापन, असामान्य लेन-देन पर निगरानी और जांच एजेंसियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी म्यूल खातों पर कार्रवाई, संदिग्ध रकम को अस्थायी रूप से रोकने और पीड़ितों की शिकायतों के निपटारे के लिए व्यवस्थाएं मजबूत करने पर निर्देश दे चुका है।
डिजिटल अरेस्ट से कैसे बचें?
डिजिटल अरेस्ट ठगी का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी का डर पैदा करते हैं। वे वीडियो कॉल के जरिए लोगों पर दबाव डालते हैं और पैसे ट्रांसफर करने को कहते हैं। याद रखें, भारत में डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई वैधानिक गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसे न भेजें और ओटीपी, पासवर्ड या बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी साझा न करें। यदि ठगी हो जाए, तो तुरंत साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर सूचना दें।