Supreme Court Tough On Aravallis: अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और उनके संरक्षण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाई-पावर्ड कमेटी को तय समय में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कमेटी की ओर से मांगी गई करीब छह महीने की अतिरिक्त समय-सीमा को मंजूर करने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने देरी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कमेटी को काम में तेजी लानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब कमेटी को 30 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी।
छह महीने की मोहलत की मांग खारिज
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए 28 फरवरी 2027 तक का समय मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि कमेटी को दिन-रात काम करके निर्धारित समय में रिपोर्ट तैयार करनी होगी। CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि पहली ही बार में इतनी लंबी मोहलत मांगना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि रिपोर्ट दाखिल करने के लिए आगे कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा।
सभी पक्षों की बात सुनना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया है कि वह मामले से जुड़े सभी पक्षों की राय सुने। इसमें राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदाय भी शामिल हैं। कमेटी जरूरत के अनुसार किसी खास मुद्दे पर अंतरिम रिपोर्ट भी कोर्ट के सामने रख सकती है, ताकि अलग-अलग पहलुओं पर निर्णय लेने में मदद मिल सके। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।
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पांच सदस्यीय कमेटी का हुआ था गठन
इस साल जून में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा और सीमांकन से जुड़े मुद्दों की व्यापक समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय विशेषज्ञ कमेटी गठित की थी। इसका नेतृत्व भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद के महानिदेशक को करना है। कमेटी में इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स के प्रोफेसर जगदीश कृष्णस्वामी और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। पर्यावरण मंत्रालय में निदेशक स्तर के अधिकारी को सदस्य सचिव की जिम्मेदारी दी गई है।
अरावली के पर्यावरणीय महत्व पर जोर
दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की बदली हुई परिभाषा को लेकर उठी चिंताओं के बाद मामले का स्वतः संज्ञान लिया था। अरावली क्षेत्र पर्यावरण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह रेगिस्तान के विस्तार को रोकने और भूजल स्तर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। आशंका जताई गई थी कि अगर इसकी परिभाषा में बदलाव हुआ तो पहले से संरक्षित माने जाने वाले इलाकों में खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। अब कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट आगे की कार्रवाई तय करेगा।