सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में जमानत को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि “बेल नियम है और जेल अपवाद।” अदालत ने कहा कि लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी की स्थिति में संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने उमर खालिद को जमानत न देने वाले फैसले पर भी सवाल उठाए और कहा कि बड़ी बेंच के फैसलों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया संवैधानिक सिद्धांत
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान का मूल अधिकार है और इसे अनिश्चितकाल तक सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत केवल सामान्य मामलों में ही नहीं बल्कि UAPA जैसे कठोर कानूनों में भी लागू होता है। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक ट्रायल लंबित रहने पर आरोपी को राहत दी जा सकती है।
उमर खालिद मामले का किया उल्लेख
सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली दंगों से जुड़े उमर खालिद मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जमानत न देने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि K.A. नजीब मामले में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि यदि आरोपी लंबे समय से जेल में हो और ट्रायल में अत्यधिक देरी हो रही हो तो संवैधानिक अदालतें जमानत देने का अधिकार रखती हैं।
छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसले नहीं बदल सकती
सुप्रीम Court ने अपने फैसले में न्यायिक अनुशासन पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि छोटी बेंचें बड़ी बेंच के फैसलों को कमजोर या नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। यदि किसी फैसले पर असहमति हो तो मामला बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए। कोर्ट ने साफ किया कि कम जजों वाली बेंच किसी बड़े फैसले की व्याख्या बदलने की कोशिश नहीं कर सकती।
लंबी हिरासत को बताया गंभीर चिंता
अदालत ने कहा कि UAPA की धारा 43D(5) का इस्तेमाल किसी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर केवल शुरुआती आरोपों के आधार पर लगातार जमानत रोकी जाती रही तो ट्रायल से पहले की हिरासत सजा में बदल सकती है। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।
NCRB आंकड़ों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपने फैसले में NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि UAPA मामलों में दोषसिद्धि दर बेहद कम है। 2019 से 2023 के बीच देशभर में इस कानून के तहत सजा की दर करीब 1.5 से 4 प्रतिशत तक रही। जम्मू-कश्मीर में कई वर्षों तक दोषसिद्धि दर लगभग शून्य रही। अदालत ने कहा कि जब अधिकांश आरोपी अंत में बरी हो जाते हैं तो वर्षों तक हिरासत में रखना गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करता है।