सुप्रीम कोर्ट में बीते कुछ वर्षों के दौरान वेतनवृद्धि को लेकर एक असामान्य स्थिति देखने को मिली, जहां कुछ कर्मचारियों को एक ही साल में कई-कई इन्क्रीमेंट मिले. यह फैसला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीशों के विवेकाधिकार से लिया गया था. अब फुल कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस व्यवस्था पर रोक लगा दी गई है, जिससे कई कर्मचारियों की बढ़ी हुई सैलरी वापस ले ली गई.
एक साल में कई इन्क्रीमेंट, बना चर्चा का विषय
आमतौर पर सरकारी और निजी नौकरियों में साल में एक बार वेतनवृद्धि होती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में कुछ वर्षों तक यह परंपरा टूटती नजर आई. कुछ कर्मचारियों को सालाना इन्क्रीमेंट के अलावा दो, तीन और कुछ मामलों में छह तक अतिरिक्त वेतनवृद्धि दी गई. इससे न सिर्फ सैलरी स्ट्रक्चर असंतुलित हुआ, बल्कि कर्मचारियों के बीच असमानता की भावना भी बढ़ी.
विवेकाधिकार से बढ़ी सैलरी
बताया गया कि अल्प कार्यकाल वाले कुछ मुख्य न्यायाधीशों ने भी रिटायरमेंट से पहले अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए निजी स्टाफ या ‘विशेष योगदान’ देने वाले कर्मचारियों को अतिरिक्त इन्क्रीमेंट दिए. इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ कर्मचारियों का वेतन सामान्य स्तर से काफी अधिक पहुंच गया, जिससे प्रशासनिक स्तर पर सवाल खड़े होने लगे.
फुल कोर्ट बैठक में लिया गया अहम फैसला
इस बढ़ती असमानता को लेकर फुल कोर्ट की बैठक बुलाई गई. चर्चा के दौरान अधिकांश न्यायाधीशों की राय थी कि वेतनवृद्धि किसी व्यक्ति विशेष की पसंद या नापसंद पर आधारित नहीं होनी चाहिए. बैठक में साफ कहा गया कि संस्थान नियमों से चलता है, न कि व्यक्तिगत विवेक से. इसके बाद अतिरिक्त और विवेकाधीन इन्क्रीमेंट की व्यवस्था को तत्काल समाप्त करने का निर्णय लिया गया.
कर्मचारियों पर पड़ा सीधा असर
फैसले के बाद जिन कर्मचारियों को अतिरिक्त वेतनवृद्धि मिली थी, उनकी सैलरी में अचानक कटौती हो गई. कई मामलों में मासिक वेतन हजारों रुपये तक कम हो गया. कुछ कर्मचारियों ने बताया कि उन्होंने बढ़ी सैलरी को आधार मानकर लोन लिया था, जिससे अब उनकी आर्थिक योजना प्रभावित हुई है.
पारदर्शिता बनाम मानवीय पहलू
हालांकि इस निर्णय को प्रशासनिक पारदर्शिता और समानता की दिशा में मजबूत कदम माना जा रहा है, लेकिन इसके मानवीय प्रभावों को लेकर असंतोष भी सामने आया है. कर्मचारियों का कहना है कि यदि बदलाव करना ही था, तो इसे धीरे-धीरे लागू किया जाना चाहिए था.