सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने रिटायरमेंट से ठीक पहले दिए जा रहे संदिग्ध न्यायिक आदेशों को लेकर गहरी चिंता जताते हुए साफ कर दिया कि अगर किसी फैसले के पीछे गलत या बाहरी मंशा पाई गई, तो संबंधित जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से परहेज नहीं किया जाएगा।
रिटायरमेंट के करीब ‘अचानक फैसलों’ पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में सामने आ रहे उस चलन पर नाराजगी जताई, जिसमें कुछ जज सेवानिवृत्ति से ठीक पहले असामान्य और चौंकाने वाले आदेश पारित कर देते हैं। अदालत ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी फैसला बिना जवाबदेही के हो। यदि फैसले की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं, तो जांच और कार्रवाई पूरी तरह जायज है।
मध्य प्रदेश के जिला जज का मामला बना वजह
यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के तत्कालीन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजाराम भारतीय से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। वे अपने रिटायरमेंट से कुछ ही दिन पहले एक ऐसे आदेश को निरस्त करने के कारण जांच के घेरे में आए, जिसमें अवैध खनन से जुड़े एक मामले में 100 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया गया था। इस आदेश को बाद में संदेहास्पद माना गया।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक राय
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि सामान्य परिस्थितियों में किसी जज के खिलाफ केवल न्यायिक आदेश के आधार पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, लेकिन अगर यह साबित हो जाए कि फैसला कानून के बजाय किसी और उद्देश्य से प्रेरित था, तो अनुशासनात्मक कदम उठाना गलत नहीं है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि अगर कोई जज जानबूझकर रिटायरमेंट से पहले गलत आदेश देता है, तो उसे जवाबदेह क्यों न ठहराया जाए।
सीधे सुप्रीम कोर्ट आने पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान बेंच ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि निलंबित जज ने पहले हाईकोर्ट का रुख करने के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की। अदालत ने इसे प्रक्रिया से हटकर कदम बताते हुए निलंबन पर तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट को फैसला लेने का समय
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जज को कोई सीधी राहत नहीं दी, लेकिन उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखने की अनुमति जरूर दी। साथ ही हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह चार सप्ताह के भीतर इस मामले पर उचित निर्णय ले।