मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच अमेरिका को कूटनीतिक मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। स्विट्जरलैंड ने अपनी तटस्थता की नीति का हवाला देते हुए अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने एयरस्पेस से गुजरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है और खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बनते जा रहे हैं।
तटस्थता की नीति पर अडिग रहा स्विट्जरलैंड
स्विट्जरलैंड लंबे समय से वैश्विक संघर्षों में तटस्थ रहने की नीति अपनाता आया है। इसी नीति का पालन करते हुए स्विस सरकार ने युद्ध से जुड़े अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने एयरस्पेस से गुजरने की अनुमति नहीं देने का फैसला किया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी सशस्त्र संघर्ष में सीधे शामिल सैन्य गतिविधियों को अपने हवाई क्षेत्र से समर्थन देना उनकी तटस्थता के सिद्धांत के खिलाफ होगा।
अमेरिकी रिकॉनिसेंस विमानों को नहीं मिली अनुमति
सरकारी जानकारी के अनुसार अमेरिका ने अपने दो टोही (रिकॉनिसेंस) विमानों को 15 मार्च को स्विट्जरलैंड के ऊपर से उड़ाने की अनुमति मांगी थी। इन विमानों का मिशन ईरान के साथ चल रहे संघर्ष से जुड़ा बताया गया था। स्विस प्रशासन ने इन उड़ानों को युद्ध से सीधे जुड़ा मानते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया।
कुछ अमेरिकी उड़ानों को मिली सीमित मंजूरी
हालांकि स्विस सरकार ने सभी अमेरिकी उड़ानों को पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया है। अधिकारियों ने मानवीय और गैर-युद्ध संबंधी उड़ानों को सीमित मंजूरी दी है। 15 मार्च को दो ट्रांसपोर्ट विमानों को स्विस एयरस्पेस से गुजरने की अनुमति दी गई, जबकि 17 मार्च को एक मेंटेनेंस से जुड़ी उड़ान को भी मंजूरी प्रदान की गई है।
मानवीय और मेडिकल उड़ानों को छूट
स्विट्जरलैंड ने स्पष्ट किया है कि मानवीय सहायता और मेडिकल मिशन से जुड़े विमानों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। घायल लोगों को ले जाने वाली उड़ानें, राहत कार्य से जुड़े विमान और अन्य मानवीय मिशन स्विस एयरस्पेस का इस्तेमाल कर सकेंगे। सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय सिद्धांतों का पालन करना उनकी प्राथमिकता है।
ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ा वैश्विक दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब तीसरे सप्ताह में पहुंच चुका है, जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। खाड़ी क्षेत्र और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास हालात संवेदनशील बने हुए हैं। इस संघर्ष का असर वैश्विक तेल सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी दिखाई देने लगा है। स्विट्जरलैंड का यह फैसला इसी बढ़ते तनाव के बीच सामने आया है।