Supreme Court Hearing on Muslim Divorce --मुस्लिम समाज में तलाक से जुड़ी कुछ प्रथाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर अहम सुनवाई होने जा रही है। तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अदालत 27 अक्टूबर से सुनवाई शुरू करेगी। इन याचिकाओं में महिलाओं के अधिकार और संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए इन प्रथाओं पर सवाल उठाए गए हैं। मामला धार्मिक परंपरा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से भी जुड़ा है।
27 अक्टूबर से शुरू होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन से जुड़ी याचिकाओं पर पहले ही नोटिस जारी कर रखा है। अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच 27 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करेगी। बताया गया है कि सरकार या दूसरे पक्षों की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया जाता है, तब भी अदालत याचिकाकर्ताओं की ओर से रखे गए मामले पर सुनवाई आगे बढ़ाएगी। इस मामले में करीब 10 मुस्लिम महिलाओं की ओर से याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
महिलाओं ने उठाए तलाक की प्रक्रिया पर सवाल
इन याचिकाओं में पत्रकार बेनजीर हीना समेत कई महिलाओं ने मुस्लिम तलाक की कुछ प्रथाओं को चुनौती दी है। बेनजीर हीना का कहना है कि उनके पति की ओर से तलाक-ए-हसन का नोटिस भेजे जाने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में दावा किया गया कि तलाक-ए-हसन संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 के तहत मिले मौलिक अधिकारों से जुड़ा सवाल खड़ा करता है। अन्य याचिकाओं में भी महिलाओं ने अपने अनुभव बताए हैं। कुछ महिलाओं ने आरोप लगाया कि उन्हें वॉट्सऐप या ईमेल के जरिए तलाक भेजा गया। वहीं कुछ ने यह शिकायत की कि अशिक्षा का फायदा उठाकर उनसे खाली कागज पर हस्ताक्षर करा लिए गए। अदालत के सामने यह भी मुद्दा रखा गया कि तकनीक के जरिए वर्चुअल तरीके से तलाक देने की कोशिशें की जा रही हैं।
तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन में क्या अंतर?
तलाक-ए-हसन में पति तीन महीने के दौरान तीन बार तलाक देता है। सामान्य तौर पर हर महीने एक बार तलाक कहने या लिखने की प्रक्रिया बताई गई है। इस दौरान सुलह की गुंजाइश बनी रहती है और पति तलाक वापस भी ले सकता है। तीन महीने की अवधि को इद्दत कहा जाता है।
तलाक-ए-अहसन में पति एक बार तलाक देता है। इसके बाद भी तीन महीने की अवधि रहती है। यदि इस अवधि में तलाक वापस नहीं लिया जाता, तो पति-पत्नी का रिश्ता खत्म माना जाता है। यही वजह है कि इन दोनों प्रक्रियाओं को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर बहस होने वाली है।
तीन तलाक पर पहले ही लग चुकी है रोक
मुस्लिमों में तलाक की प्रथाओं का मुद्दा नया नहीं है। साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत यानी एक साथ तीन तलाक देने की प्रथा पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 2019 में केंद्र सरकार ने इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया। मौजूदा कानून के तहत तीन तलाक देने पर तीन साल तक की जेल का प्रावधान है। हालांकि, तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन पर स्थिति अलग रही है। अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन को लेकर कहा था कि इसमें पति-पत्नी के बीच सुलह के लिए समय मिलता है। उस समय अदालत ने महिलाओं के लिए 'खुला' के विकल्प का भी जिक्र किया था। हिमाचल प्रदेश और केरल हाई कोर्ट भी तलाक-ए-हसन में हस्तक्षेप करने से इनकार कर चुके हैं।
महिलाओं के पास कौन से विकल्प हैं?
इस्लाम में महिलाओं के लिए भी निकाह खत्म करने के रास्ते बताए गए हैं। इनमें 'खुला' शामिल है, जिसके जरिए महिला पति से अलग होने की मांग कर सकती है। इसके लिए आपसी सहमति की जरूरत होती है। पति सहमत नहीं होने पर अदालत का रास्ता अपनाया जा सकता है। खुला के मामले में निकाह के समय मिली मेहर की रकम लौटाने की बात भी बताई गई है।
इसके अलावा 'मुबारत' का विकल्प भी है। इसमें पति और पत्नी दोनों अपनी इच्छा और आपसी सहमति से वैवाहिक रिश्ता खत्म करने के लिए राजी होते हैं।