
Taliban Foreign Minister: अफगानिस्तान के विदेश मंत्री और वरिष्ठ तालिबान नेता आमिर खान मुत्ताकी शनिवार को उत्तर प्रदेश के देवबंद में स्थित प्रसिद्ध इस्लामी संस्थान दारुल उलूम देवबंद का दौरा करेंगे। मुत्ताकी यहां संस्थान के मोहतमिम मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी, मौलाना अरशद मदनी और अन्य शिक्षकों से मुलाकात करेंगे। इस दौरान वे मस्जिद में नमाज अदा करेंगे और हदीस की कक्षाओं का निरीक्षण भी करेंगे। दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक मौलाना अरशद मदनी और मुत्ताकी की तकरीर का कार्यक्रम भी रखा गया है। यह दौरा धार्मिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक — तीनों दृष्टियों से बेहद अहम माना जा रहा है।
#WATCH | Uttar Pradesh: Afghanistan Foreign Minister Amir Khan Muttaqi to visit Darul Uloom Deoband in Saharanpur today.
— ANI (@ANI) October 11, 2025
(Visuals from Darul Uloom Deoband) pic.twitter.com/Qqwx6dZkwR
भारत से तालिबान की धार्मिक निकटता का संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि मुत्ताकी का यह दौरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक संकेत भी है। दरअसल, पाकिस्तान लंबे समय से खुद को देवबंदी विचारधारा का संरक्षक और तालिबान का समर्थक बताता रहा है। मगर मुत्ताकी की भारत यात्रा और देवबंद दौरा इस दावे को चुनौती देता है। यह इस बात का प्रतीक है कि तालिबान की वैचारिक जड़ें भारत की धरती से जुड़ी हैं, न कि पाकिस्तान से। इससे यह संदेश भी जाता है कि अफगानिस्तान अब कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान पर निर्भरता घटाकर भारत के साथ अपने संबंधों को नए आयाम देना चाहता है। 1866 में स्थापित दारुल उलूम देवबंद इस्लामी शिक्षा का विश्वप्रसिद्ध केंद्र है, जिसने दक्षिण एशिया में इस्लामी विचारधारा को आकार दिया।
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दारुल उलूम से अफगानिस्तान का पुराना रिश्ता
दारुल उलूम देवबंद और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से धार्मिक संबंध रहे हैं। संस्थान में वर्तमान में 15 अफगान छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि 2000 से पहले यहां सैकड़ों छात्र शिक्षा के लिए आते थे। तालिबान सरकार आज भी देवबंद के शिक्षित विद्वानों को सम्मान देती है और उन्हें सरकारी पदों पर प्राथमिकता देती है। बता दें कि इससे पहले 1958 में अफगानिस्तान के बादशाह मोहम्मद ज़ाहिर शाह ने भी देवबंद का दौरा किया था। उनके सम्मान में संस्थान में “बाब-ए-ज़ाहिर” नामक गेट बनाया गया था। मुत्ताकी की यह यात्रा न केवल ऐतिहासिक परंपरा को पुनर्जीवित करती है, बल्कि भारत-अफगान संबंधों में नई धार्मिक कूटनीति का अध्याय भी खोलती है।