Lok Sabha intensifies: लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत को लेकर राजनीतिक चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। कुछ विपक्षी दलों में संभावित टूट और नए राजनीतिक समीकरणों की अटकलों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या तक पहुंच सकता है। फिलहाल यह बहस राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
दो-तिहाई बहुमत का गणित क्या कहता है?
लोकसभा की कुल 543 सीटों में से वर्तमान में तीन सीटें रिक्त बताई जा रही हैं। ऐसे में प्रभावी सदस्य संख्या 540 मानी जाए तो दो-तिहाई बहुमत के लिए लगभग 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा। संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार को इस स्तर के समर्थन की जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि संसद में संख्या बल को लेकर लगातार चर्चा हो रही है।
फिलहाल NDA की स्थिति
भारतीय जनता पार्टी के पास लोकसभा में 240 सांसद हैं। सहयोगी दलों को मिलाकर NDA की कुल संख्या करीब 293 बताई जाती है। यानी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए गठबंधन को अभी भी बड़ी संख्या में अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में केवल सहयोगी दलों के सहारे यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं दिखता।
विपक्षी दलों में टूट की अटकलें
हाल के दिनों में कुछ विपक्षी दलों में असंतोष और संभावित टूट की चर्चाएं सामने आई हैं। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी), समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी को लेकर विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि संबंधित दलों की ओर से कई दावों का खंडन भी किया गया है। यदि भविष्य में किसी दल के सांसद सत्ता पक्ष का समर्थन करते हैं, तो लोकसभा का गणित बदल सकता है।
संख्या बढ़ने पर भी चुनौती बरकरार
राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि यदि कुछ क्षेत्रीय दल या उनके सांसद NDA के पक्ष में आते हैं तो गठबंधन की ताकत बढ़ सकती है। फिर भी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हासिल करना आसान नहीं माना जा रहा। संसद में विभिन्न दलों और निर्दलीय सांसदों की भूमिका ऐसे किसी भी समीकरण में महत्वपूर्ण रहेगी। फिलहाल यह पूरा मामला संभावनाओं और राजनीतिक अटकलों के दायरे में है, जबकि वास्तविक स्थिति आने वाले समय में ही स्पष्ट हो पाएगी।