टैरिफ का भुगतान भारतीय कंपनियां सीधे अमेरिकी सरकार को नहीं करतीं, बल्कि अमेरिकी आयातक सीमा शुल्क चुकाते हैं। इसके बाद यह लागत अक्सर उत्पाद की कीमत में शामिल हो जाती है। अमेरिका और भारत के बीच रूसी तेल को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े कानून पर हस्ताक्षर किए हैं। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को मिला है। भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार इसकी जद में आ सकते हैं। हालांकि टैरिफ कब और किस देश पर लगाया जाएगा, इसका अंतिम फैसला अभी अमेरिकी प्रशासन के हाथ में है।
भारत पर टैरिफ लगा तो अमेरिका को भी असर
टैरिफ का भुगतान भारतीय कंपनियां सीधे अमेरिकी सरकार को नहीं करतीं, बल्कि अमेरिकी आयातक सीमा शुल्क चुकाते हैं। इसके बाद यह लागत अक्सर उत्पाद की कीमत में शामिल हो जाती है। ऐसे में भारतीय कपड़े, मशीनरी, दवाइयां और दूसरे सामान अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं। अमेरिकी कंपनियां यदि बढ़ी लागत का बड़ा हिस्सा ग्राहकों पर डालती हैं तो इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार में यह असर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका भारतीय निर्यात का बड़ा बाजार है। 100 फीसदी तक टैरिफ लागू होने की स्थिति में दोनों देशों की कंपनियों की सप्लाई चेन और व्यापारिक समझौतों पर दबाव बढ़ सकता है।
रूसी तेल पर रोक से तेल बाजार में हलचल
दूसरा बड़ा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है। भारत रूसी कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार है। अगस्त 2026 में भारत ने करीब 16 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी कच्चा तेल आयात किया था। अगर भारत जैसे बड़े खरीदार रूसी तेल से अचानक दूरी बनाते हैं तो बाजार में उपलब्ध तेल की मात्रा प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में अगर वैश्विक कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो इसका असर अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। खासकर मौजूदा समय में पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति पहले ही दबाव में है। रूस की सप्लाई में बड़ी कटौती बाजार पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
इसलिए मामला सिर्फ भारत बनाम अमेरिका नहीं
यही वजह है कि रूसी तेल पर दबाव डालने की अमेरिकी नीति का असर केवल भारत और रूस तक सीमित नहीं रह सकता। एक तरफ वॉशिंगटन रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक तेल आपूर्ति में बड़ा व्यवधान अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी महंगा साबित हो सकता है। इसी संतुलन को देखते हुए नए कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को प्रतिबंधों से छूट देने का अधिकार भी दिया गया है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप प्रशासन भारत पर 100 फीसदी तक का टैरिफ वास्तव में लागू करता है या बातचीत और छूट के रास्ते को प्राथमिकता देता है। भारत पहले ही कह चुका है कि वह अमेरिका के साथ संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यापार संबंध चाहता है।