
बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर जिसे देवार्क सूर्य मंदिर भी कहा जाता है। आस्था और चमत्कार का अद्भुत संगम है। यह मंदिर सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही खास नहीं है, बल्कि अपनी अनूठी स्थापत्य कला और रहस्यमयी कहानियों के कारण भी देशभर के श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर (देवार्क सूर्य मंदिर) अपनी भव्यता, रहस्यमयी इतिहास और अद्वितीय वास्तुकला के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। आमतौर पर सूर्य मंदिर पूर्वाभिमुख बनाए जाते हैं, लेकिन यह मंदिर पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए है। लोकमान्यता है कि इसका प्रवेश द्वार रातों-रात बदल गया था। यही कारण है कि इसे चमत्कारिक मंदिर माना जाता है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी ‘वोट अधिकार यात्रा’ के दौरान इस मंदिर पहुंचे। उन्होंने भगवान सूर्य देव के दर्शन किए और आशीर्वाद लिया। इसके बाद यह मंदिर एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
13वीं शताब्दी में हुआ था निर्माण
देव सूर्य मंदिर का निर्माण लगभग 13वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। यह मंदिर भगवान सूर्य देव को समर्पित है, जिन्हें हिंदू धर्म में साक्षात जीवित देवता कहा गया है। विशेष बात यह है कि अन्य सूर्य मंदिर जहां पूर्वाभिमुख होते हैं, वहीं देव सूर्य मंदिर पश्चिमाभिमुख है। मान्यता है कि इस दिशा परिवर्तन के पीछे एक अद्भुत चमत्कार छिपा है।
प्रवेश द्वार बदलने के पीछे चमत्कार
स्थानीय किंवदंतियों और इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में विश्वकर्मा ने किया था। ऐसा माना जाता है कि मंदिर का मुख मूल रूप से पूर्व दिशा में था। लेकिन कुछ कारणों से, जो आज भी एक रहस्य बने हुए हैं, रातों-रात इस मंदिर के प्रवेश द्वार की दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर बदल गई। इस घटना के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं, जिनमें से एक कहानी यह भी है कि मंदिर के निर्माण के दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण विश्वकर्मा को मंदिर की दिशा बदलनी पड़ी।
ये भी है मान्यता
लोककथाओं के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब ने जब इस मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया, तो मंदिर के पुजारियों और भक्तों ने सूर्य देव से प्रार्थना की। कहते हैं कि तभी रातों-रात मंदिर का प्रवेश द्वार बदल गया और मंदिर पश्चिम दिशा की ओर मुख कर गया। यही कारण है कि यह मंदिर आज भी पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है।
मंदिर का परिचय और वास्तुकला
इसकी वास्तुकला कोणार्क के सूर्य मंदिर से काफी मिलती-जुलती है, लेकिन इसके कुछ अद्वितीय पहलू इसे और भी खास बनाते हैं। मंदिर का मुख पूर्व दिशा के बजाय पश्चिम दिशा में है, जो इसे बाकी सूर्य मंदिरों से बहुत अलग है। आमतौर पर, सूर्य देव के मंदिर का द्वार पूर्व दिशा में खुलता हैं ताकि सूर्योदय की पहली किरणें सीधे गर्भगृह में प्रवेश कर सकें, लेकिन देवार्क सूर्य मंदिर की दिशा पश्चिम में होने के कारण यह एक रहस्य का विषय बन गया है।
इतिहास और आस्था का अद्भुत मेल
देव सूर्य मंदिर का धार्मिक महत्व बहुत बड़ा है। यहां पर छठ महापर्व के समय लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। भक्त सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं और विशेष पूजन करते हैं। मंदिर परिसर में स्थित सूर्य कुंड का भी बहुत महत्व है। कहा जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से त्वचा संबंधी रोग और अन्य बीमारियां दूर हो जाती हैं।देव सूर्य मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यह बिहार की प्राचीन संस्कृति, शिल्पकला और आस्था का प्रतीक भी है। यहां धर्म, इतिहास और लोककथाओं का संगम देखने को मिलता है।