
अयोध्या नगरी का नाम आते ही भगवान श्रीराम और उनके अनन्य भक्त हनुमान जी की याद आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यहां एक ऐसा प्राचीन सिद्धपीठ है जहां हनुमान जी को देवी के स्वरूप में पूजा जाता है? यह मंदिर "कालेराम मंदिर" के नाम से प्रसिद्ध है और इसकी मान्यता इतनी अद्भुत है कि यहां भक्त हनुमान जी को मां दुर्गा के रूप में आशीर्वाद देने वाली शक्ति मानते हैं।
पारंपरिक मान्यता
हनुमान जी हिंदू धर्म में ऐसे देवता माने जाते हैं जो अपने भक्तों को बल, बुद्धि और साहस प्रदान करते हैं। वे आजीवन ब्रह्मचारी रहे, इसी कारण पारंपरिक मान्यता के अनुसार स्त्रियों को उनसे दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है। हालांकि, कई महिलाएं उन्हें पिता और रक्षक के रूप में मानकर पूजती भी हैं। स्वयं हनुमान जी अपने हृदय में माता सीता को स्थापित किए हुए हैं और उनका आदर-पूजन करते हैं। रोचक बात यह है कि जहां प्रचलित मान्यता के अनुसार हनुमान जी को स्त्रियों से दूर रखा जाता है, वहीं अयोध्या नगरी में एक ऐसा अनोखा मंदिर है जहां उन्हें देवी स्वरूप में पूजा जाता है। यह मंदिर उनकी अद्भुत शक्तियों और बहुमुखी स्वरूप का प्रतीक है। यहां भक्त हनुमान जी को सिर्फ वीर पुरुष ही नहीं, बल्कि मां के रूप में पूजकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। सरयू नदी के किनारे स्थित इस सिद्धपीठ को कालेराम मंदिर के नाम से जाना जाता है।
2000 साल पुरानी प्रतिमा और अनोखी परंपरा
इस मंदिर में हनुमान जी की लगभग दो हजार वर्ष पुरानी प्रतिमा विराजमान है। खास बात यह है कि यहां उन्हें स्त्री स्वरूप में सजाया जाता है। साड़ी पहनाकर, श्रृंगार करके और देवी की तरह उनका पूजन किया जाता है। भक्त उन्हें मां मानकर उनकी आराधना करते हैं। मान्यता है कि इस सिद्धपीठ की स्थापना राजा विक्रमादित्य ने करवाई थी। कहा जाता है कि लंका विजय के बाद माता सीता ने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया था कि भविष्य में कुछ स्थानों पर उन्हें "सिंहनी रूप" में पूजा जाएगा। इसी आशीर्वाद के फलस्वरूप अयोध्या के कालेराम मंदिर में हनुमान जी देवी के रूप में पूजे जाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस रूप में वे मां दुर्गा की तरह रक्षा करते हैं और शक्ति प्रदान करते हैं।
अहिरावण वध से जुड़ी पौराणिक कथा
इस मंदिर की मान्यता अहिरावण वध की कथा से भी जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, अहिरावण ने भगवान राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में ले जाकर देवी को बलि चढ़ाने की योजना बनाई थी। उस समय हनुमान जी ने देवी का रूप धारण कर अहिरावण का वध किया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने बाएं पैर से अहिरावण को कुचलकर उसका अंत किया। तभी से यह मान्यता है कि पाताल विजय के दौरान हनुमान जी ने देवी रूप धारण किया था और उसी स्वरूप की आराधना इस मंदिर में होती है।